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सुनियोजित साजिश के तहत किए गए थे दंगे - दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग

 दंगों की जांच के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की गठित कमेटी का कहना है कि दिल्ली के उत्तर-पूर्वी ज़िले में फ़रवरी में हुए दंगे सुनियोजित, संगठित थे और निशाना बनाकर किए गए थे। यही नहीं 23 फ़रवरी, 20 को भाजपा नेता कपिल मिश्रा के मौजपुर में दिए गए भाषण के फ़ौरन बाद दंगे भड़क गए।


इस भाषण में कपिल मिश्रा ने जाफ़राबाद में सीएए के विरोध में बैठे प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटाने की बात की थी और दिल्ली पुलिस के डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या की मौजूदगी में कपिल मिश्रा ने ये भड़काऊ भाषण दिया था। दिल्ली दंगों की भूमिका सीएए विरोधी आन्दोलनों में ही पड़ गयी थी। हालांकि दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किए गए एक हलफ़नामे में कहा है कि अब तक उन्हें ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जिनके आधार पर ये कहा जा सके कि भाजपा नेता कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर ने किसी भी तरह लोगों को भड़काया हो या दिल्ली में दंगे करने के लिए उकसाया हो।

दिल्ली पुलिस ने ये हलफ़नामा एक याचिका के जवाब में दाखिल किया जिसमें उन नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की बात कही गई है, जिन्होंने जनवरी-फ़रवरी में विवादित भाषण दिया था। हलफ़नामे में डिप्टी कमिश्नर (क़ानून विभाग) राजेश देव ने ये भी कहा कि अगर इन कथित भड़काऊ भाषणों और दंगों के बीच कोई लिंक आगे मिलेगा तो उचित एफ़आईआर दर्ज़ की जाएगी। दिल्ली पुलिस की तरफ़ से दंगों को लेकर दर्ज कुल 751 आपराधिक मामलों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट में कहा गया कि शुरुआती जाँच में ये पता चला है कि ये दंगे ‘त्वरित हिंसा’ नहीं थे बल्कि बेहद सुनियोजित तरीक़े से सोच समझ कर ‘सामाजिक सामंजस्य बिगाड़ा’ गया।

दिल्ली पुलिस की भूमिका पर रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दंगों में दिल्ली पुलिस की भूमिका बहुत ख़राब थी। कई जगहों पर वो तमाशाई बने रहे या फिर दंगाइयों को शह देते रहे। चश्मदीदों के अनुसार अगर किसी एक जगह एक पुलिस वाले ने दंगाइयों को रोकने की कोशिश की भी तो उसके साथी पुलिस वाले ने उसे ही रोक दिया। पीड़ितों के अनुसार पुलिस ने कई मामलों में एफ़आईआर लिखने से मना कर दिया और कई बार संदिग्ध का नाम हटाने के बाद एफ़आईआर लिखी। कई जगहों पर पुलिस वाले दंगाइयों को हमले के बाद ख़ुद सुरक्षित निकाल कर ले गए और कई जगह तो कुछ पुलिस वाले ख़ुद हमले में शामिल थे।

दिल्ली में 23 से 27 फ़रवरी के बीच दंगे हुए थे जिसमें आधिकारिक तौर पर 53 लोग मारे गए थे। इसकी जाँच के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने नौ मार्च को नौ सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के वकील एमआर शमशाद कमेटी के चेयरमैन थे जबकि गुरमिंदर सिंह मथारू, तहमीना अरोड़ा, तनवीर क़ाज़ी, प्रोफ़ेसर हसीना हाशिया, अबु बकर सब्बाक़, सलीम बेग, देविका प्रसाद और अदिति दत्ता कमेटी के सदस्य थे। कमेटी ने 134 पन्नों की अपनी रिपोर्ट 27 जून को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग को सौंप दी थी लेकिन आयोग ने 16 जून को ये रिपोर्ट सार्वजनिक की है।

कमेटी का कहना है कि उसने दंगों की जगह पर जाकर पीड़ितों के परिवारों से बात की, उन धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया जिनको दंगों में नुक़सान पहुँचाया गया था। कमेटी ने दिल्ली पुलिस से भी इस मामले में संपर्क किया और उनका पक्ष जानना चाहा, लेकिन कमेटी के अनुसार दिल्ली पुलिस ने उनके किसी भी सवाल या संवाद का कोई जवाब नहीं दिया। दिल्ली पुलिस पहले भी अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार कर चुकी है और गृह मंत्री अमित शाह संसद में कह चुके हैं कि दिल्ली दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस ने अच्छा काम किया।

दंगे शुरू होने के सम्बन्ध में रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) बनने के बाद देशभर में इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली में भी कई जगहों पर सीएए के विरोध में प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के कई नेताओं ने सीएए विरोधियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के लिए भाषण दिए। ऐसे कई भाषणों को इस रिपोर्ट का हिस्सा बनाया गया है। हिंदू दक्षिणपंथी गुटों के ज़रिए सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को डराने धमकाने के लिए उन पर हमले किए गए। 30 जनवरी को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रदर्शनकारियों पर राम भक्त गोपाल ने गोली चलाई और एक फ़रवरी को कपिल गुर्जर ने शाहीन बाग़ में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।

23 फ़रवरी को भाजपा नेता कपिल मिश्रा के मौजपुर में दिए गए भाषण के फ़ौरन बाद दंगे भड़क गए। इस भाषण में कपिल मिश्रा ने जाफ़राबाद में सीएए के विरोध में बैठे प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटाने की बात की थी और दिल्ली पुलिस के डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या की मौजूदगी में कपिल मिश्रा ने ये भडकाऊ भाषण दिया था। हथियारबंद भीड़ ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाक़ों में लोगों पर हमले किए, उनके घरों और दुकानों को आग लगा दी। इस दौरान भीड़ जय श्रीराम, हर-हर मोदी, काट दो इन………. को और आज तुम्हें आज़ादी देंगे जैसे नारे लगा रही थी।

रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों की दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया जिसमें स्थानीय युवक भी थे और कुछ लोग बाहर से लाए गए थे। अगर दुकान के मालिक हिंदू हैं और मुसलमान ने किराए पर दुकान ले रखी थी तो उस दुकान को आग नहीं लगाई गई थी, लेकिन दुकान के अंदर का सामान लूट लिया गया था।पीड़ितों से बातचीत के बाद लगता है कि ये दंगे अपने आप नहीं भड़के बल्कि ये पूरी तरह सुनियोजित और संगठित थे और लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार 11 मस्जिद, पाँच मदरसे, एक दरगाह और एक क़ब्रिस्तान को नुक़सान पहुँचाया गया। मुस्लिम बहुल इलाक़ों में किसी भी ग़ैर-मुस्लिम धर्म-स्थल को नुक़सान नहीं पहुँचाया गया था।

यूपी दंगे की एक तस्वीर।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं को निशाना बनाया गया। महिला पीड़ितों के अनुसार कई जगहों पर उनके नक़ाब और हिजाब उतारे गए। दंगाई और पुलिस वालों ने धरने पर बैठी महिलाओं को निशाना बनाया और इसमें कई पुरुष पुलिसकर्मी ने महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की। उनको रेप करने और एसिड हमले करने की धमकी दी गई।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की है कि सरकार या अदालत से अनुरोध किया जाए कि हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय कमेटी बनाई जाए। जज की अध्यक्षता वाली कमेटी एफ़आईआर नहीं लिखने, चार्जशीट की मॉनिटरिंग, गवाहों की सुरक्षा, दिल्ली पुलिस की भूमिका और उनके ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई जैसे मामलों में अपना फ़ैसला सुनाए। कमेटी ने ये भी कहा है कि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग को अपने एक्ट के अनुसार दंगों में शामिल होने या अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाने वाले दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट)

Update 17Julay 2020

साभार: जन चौक

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