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काकोरी मुकदमे के इंचार्ज तसदुक हुसैन, डिप्टी सुप्रिटेंडेंट सी.आई. डी. इम्पीरियल ब्रांच ने अश्फाकुल्लाह से जेल में भेंट की और कहा कि "देखो अफर हम दोनों मुसलमान हैं, राम प्रसाद हिन्दू है और हिन्दू राज्य स्थापित करना चाहता है। पुलिस को सभी बातों का ज्ञान हो गया है। अगर तुम साफ-साफ पुलिस को सब बता दो तो तुम बच सकते हो।" अशफाकुल्लाह ने कठोर स्वर में उत्तर दिया कि मैं ऐसी बातें सुनना पसंद नहीं करता। पंडित सच्चे भारतीय हैं और देश से सांप्रदायिकता समाप्त करना चाहते हैं।

सांप्रदायिकता को हराने के लिए आज भी  पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला जैसी दोस्ती की जरूरत है।

 हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य सरकार से सीधा मुकाबला करना चाहते थे और कुछ न कुछ करके मर मिटने को तैयार थे।सदस्यों को बराबर रुपये पैसे की आवश्यकता रहती थी। इसलिए एक बड़ी स्कीम बनाई गई और यह निश्चित हुआ कि लखनऊ के पास आठ डाऊन टेन को रोक कर आने वाला रेल का खजाना लूट लिया जाए। काकोरी स्टेशन के निकट एक सुनसान स्थान चुन लिया गया। सभी तैयारी निर्भयता और तत्परता के साथ हुई।


9 अगस्त को शाम दस बजे शाहपुर से आठ डाऊन पैसिंजर ट्रेन में सवार  होकर लखनऊ के लिए चल पड़े। अश्फाकुल्लाह सेकेंड कालम के डब्बे में थे और अन्य तीसरे श्रेणी के अलग-अलग डब्बों में सवार थे। उनके पास पिस्तौल, संदूक तोड़ने के लिए हथौड़ा, छेनी और कुल्हाड़ी आदि थी।गाड़ी जब काकोरी स्टेशन के निकट पहुंची तो सतरे की जंजीर खींच ली गई। गाड़ी रुकते ही गार्ड नीचे उतर आया। उसके सीने पर पिस्तौल तान ली गई। एक युवक ने अंग्रेज़ ड्राईवर को कुर्सी से नीचे गिरा दिया। दो व्यक्तियों ने ब्रेक वेन से लोहे के संदूक को गिरा दिया। अश्फाकुल्लाह के हथौड़ों की चोट से लोहे की संदूक में छेद हो गया और उसमें से रुपये के थैले निकाल कर यह लोग चल दिए। लखनऊ नगर में इस घटना की सूचना बिजली की भाँति फैल गई। पुलिस ने उन लोगों की तत्परता से खौज प्रारम्भ कर दी। दुर्भाग्य की बात कि जल्दी में एक व्यक्ति अपनी चादर वहीं छोट आया, जहाँ पर ट्रेन लूटी गई थी। उस चादर पर धोबी का निशान था। उधर शाहपुर में लाए हुए नम्बरों के कुछ नोट भी पुलिस के हाथ लग गए। जगह-जगह गिरफ्तारियाँ होने लगीं। शाहपुर के एक बढ़ई बनारसी लाल और गर्वन्मेंट हाई स्कूल के बंगाली विद्यार्थी इन्द्र भूषण मिश्रा ने पुलिस को सारी बातें बता दीं। यह दोनों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के भरोसे के व्यक्ति थे और उन्हीं के द्वारा वह अपनी ठाक भेजा करते थे। जब अशफाक उल्लाह को उन लोगों की गिरफ्तारी का ज्ञान हुआ तो वह भाग गए।

8 सितम्बर, 1926 को गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद अश्फाकुल्लाह को लखनऊ लाया गया। लखनऊ सेंट्रल जेल में कदम रखा तो सभी कैदी उन्हें देखने के लिए आए। काकोरी मुकदमे के इंचार्ज तसदुक हुसैन, डिप्टी सुप्रिटेंडेंट सी.आई. डी. इम्पीरियल ब्रांच ने अश्फाकुल्लाह से जेल में भेंट की और कहा कि "देखो अफर हम दोनों मुसलमान हैं, राम प्रसाद हिन्दू है और हिन्दू राज्य स्थापित करना चाहता है। पुलिस को सभी बातों का ज्ञान हो गया है। अगर तुम साफ-साफ पुलिस को सब बता दो तो तुम बच सकते हो।"अशफिकुल्लाह ने कठोर स्वर में उत्तर दिया कि मैं ऐसी बातें सुनना पसंद नहीं करता।पंडित सच्चे भारतीय हैं और देश से सांप्रदायिकता समाप्त करना चाहते हैं।

यह सारी घटना सप्लिमेंट्री काकोरी केस" के नाम से प्रसिद्ध है

प्रस्तुति  : एस ए बेताब संपादक "बेताब समाचार एक्सप्रेस"


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