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#minoritiesday18decemberहर साल 18 दिसंबर को अल्पसंख्यक दिवस मनाया जाता है।

 


एस ए बेताब(लेखक दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की मुस्लिम एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं)

हर साल 18 दिसंबर को  अल्पसंख्यक दिवस मनाया जाता है। अल्पसंख्यक अधिकार दिवस की शुरुआत अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 18 दिसंबर 1992 को घोषणा कर अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों के संरक्षण एवं उनके कल्याण सुनिश्चित करने की व्यवस्था करने की मांग की गई। वर्ष 2022 में अल्पसंख्यक अधिकार दिवस रविवार, 18 दिसंबर को मनाया जा रहा है। भारतीय संविधान में भारत के हर नागरिक को समानता का अधिकार है। देश का संविधान बनाने में करीब 2 साल 11 माह 18 दिन का वक्त लगा। इतना अधिक समय लगने के पीछे का कारण था देश में फिर कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं हो। इसलिए संविधान में अल्पसंख्यक और पिछड़े लोगों का विशेष ध्‍यान रखा गया। 

हर साल 18 दिसंबर को मनाया जाने वाला अल्पसंख्यक दिवस (Minorities Rights Day) के बारे में हमें जानना बहुत जरूरी है। तो आइए जानते हैं खास दिवस पर 10 बड़ी बातें- 

1. हर साल 18 दिसंबर को यह दिवस मनाया जाता है। अल्पसंख्यक अधिकार दिवस की शुरुआत अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 18 दिसंबर 1992 को घोषणा कर अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों के संरक्षण एवं उनके कल्याण सुनिश्चित करने की व्यवस्था करने की मांग की गई। यह घोषणा को यू.एन. डिक्लेरेशन ऑन माइनॉरिटी के नाम से जाना जाता है।


2. अल्पसंख्यक समुदायों को विकास से जुड़ें, कल्याण से जुड़े मामलों में, अधिकार, शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों में कल्‍याण हेतु जागरूक करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है।

3. भारत में राष्‍ट्र- राज्‍य में रहने वाले ऐसे समुदाय जिनकी संख्या कम है। जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हों। साथ ही प्रजाति, भाषा, धर्म या परंपरा बहुसंख्यकों से अलग लेकिन राष्ट्र निर्माण, एकता, सांस्कृतिक परंपरा, को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। भारत में कुछ समुदायों को अल्पसंख्यक के तौर पर चिन्हित किया गया है जिसमें मुस्लिम, बौद्ध, सिख, ईसाई, पारसी और जैन समुदाय भी।

4. भारत में अल्पसंख्यक होने का आधार भाषा और धर्म माना गया है। हालांकि यह बहुत बड़ा विषय है। धर्म-जाति के आधार पर अल्पसंख्यकों की पुष्टि करना। क्योंकि इसमें और भी कई सारे फैक्टर है जो इसे अलग कर सकते हैं।

5. अल्पसंख्यक क्षेत्र विशेष में उनकी जाति, धर्म, संस्कृति, भाषा, परंपरा की सुरक्षित रहे यह मुख्‍य उद्देश्‍य है। हालांकि संविधान में भाषा और धर्म को अल्पसंख्यक माना गया है।

6. भारत की कुल जनसंख्या में करीब 19 फीसदी ही अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

7. अल्पसंख्यक भारतीय संविधान की धारा 15 और धारा 16 के मौलिक अधिकारों में लिखा है। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को उनका विशेष अधिकार मिले। ऐसे लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलेगा।

8. भारत देश में अल्पसंख्यकों के लिए अलग से मंत्रालय है।

 9. भारत में अल्पसंख्यकों का मंत्रालय लोगों को उनके अधिकारों, रक्षा, सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार, संवैधानिक अधिकार, आर्थिक सशक्तिकरण, महिला सशक्तिकरण, समान अवसर, कानून के तहत सुरक्षा और संरक्षण आदि के प्रति लोगों को जागरूक करता है।


अल्पसंख्यकों के उत्थान में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की भूमिका, आयोग की चुनौतियाँ चर्चा में क्यों?

इसी वर्ष अक्तूबर माह में मनजीत सिंह राय के सेवानिवृत्त होने के बाद सात सदस्यीय राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) मात्र एक सदस्य के साथ कार्य कर रहा है।

प्रमुख बिंदु

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) में पाँच सदस्यों के पद मई माह से ही रिक्त थे, जबकि अक्तूबर माह में मनजीत सिंह राय के सेवानिवृत्त होने के बाद कुल छह पद रिक्त हो गए थे।वर्तमान में आतिफ रशीद, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) के उपाध्यक्ष और आयोग के एकमात्र सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं।

नई नहीं है समस्या

यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) कम सदस्यों के साथ कार्य कर रहा है, वर्ष 2017 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) के सभी सात पद दो महीनों के लिये रिक्त थे और आयोग बिना सदस्यों के कार्य कर रहा था।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और अन्य अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्त्व करने वाले राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) में नियुक्तियाँ न करने को लेकर अकसर सरकार की आलोचना की जाती रहती है।

वर्ष 2017 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) में नियुक्तियों को मंज़ूरी देने में केंद्र सरकार की ‘निष्क्रियता’ के विरुद्ध दायर याचिका पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया मांगी थी।

प्रभाव

एक महत्त्वपूर्ण निकाय के रूप में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) भारत के अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्त्व प्रदान करता है, जिससे उन्हें लोकतंत्र में अपने आप को प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है और जब आयोग में नियुक्तियाँ नहीं की जाती हैं तो यह प्रतीत होता है कि लोकतंत्र और नीति निर्माण में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्त्व का मौका नहीं दिया जा रहा है।

आयोग ने अतीत में कई महत्त्वपूर्ण सांप्रदायिक दंगों और संघर्षों की जाँच की है, उदाहरण के लिये वर्ष 2011 के भरतपुर सांप्रदायिक दंगों की जाँच आयोग ने की थी और वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम संघर्ष की जाँच के लिये भी आयोग ने एक दल असम भेजा था। इसलिये यह आयोग सांप्रदायिक संघर्षों की जाँच करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, किंतु आयोग की ‘निष्क्रियता’ के कारण इस प्रकार की घटनाओं की जाँच पर प्रभाव पड़ता है, जिससे लोगों के बीच अविश्वास की भावना उत्पन्न होती है।

वर्ष 2004 में सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता में सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण पर स्थायी समिति ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) को मज़बूत करने के लिये कुछ विशिष्ट सिफारिशें की थीं, जिसमें आयोग को जाँच के लिये अधिक शक्तियाँ प्रदान करना भी शामिल था, हालाँकि सरकार ने समिति की इन सिफारिशों को लागू नहीं किया था।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM)

अल्पसंख्यक आयोग एक सांविधिक निकाय है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत की गई थी।

यह निकाय भारत के अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और हितों की रक्षा हेतु अपील के लिये एक मंच के रूप में कार्य करता है। 

संरचना: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के मुताबिक, आयोग में अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष समेत कुल सात सदस्य का होना अनिवार्य है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदायों के सदस्य शामिल हैं।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का कार्य: 

संघ और राज्यों के तहत अल्पसंख्यकों के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना;

संविधान और संघ तथा राज्य के कानूनों में अल्पसंख्यकों को प्रदान किये गए सुरक्षा उपायों की निगरानी करना;

अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की सुरक्षा के लिये नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु आवश्यक सिफारिशें करना;

अल्पसंख्यकों को उनके अधिकारों और रक्षोपायों से वंचित करने से संबंधित विनिर्दिष्ट शिकायतों की जाँच पड़ताल करना;

अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किसी भी प्रकार के विभेद के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं का अध्ययन करना/करवाना और इन समस्याओं को दूर करने के लिये सिफारिश करना;

अल्पसंख्यकों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास से संबंधित विषयों का अध्ययन अनुसंधान और विश्लेषण करना;


केंद्र अथवा राज्य सरकारों को किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित उपायों को अपनाने का सुझाव देना; 

केंद्र और राज्य सरकारों को अल्पसंख्यकों से संबंधित किसी विषय पर विशिष्टतया कठिनाइयों पर नियतकालिक अथवा विशिष्ट रिपोर्ट प्रदान करना;

कोई अन्य विषय जो केंद्र सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किया जाए।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की चुनौतियाँ

प्रशासनिक चुनौतियाँ: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 13 के मुताबिक, आयोग को प्रत्येक वर्ष एक वार्षिक रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी, ज्ञात हो कि यह रिपोर्ट वर्ष 2010 के बाद से अब तक प्रस्तुत नहीं की गई है।

राजनीतिक नियुक्तियाँ: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) में नियुक्त होने वाले सदस्यों को लेकर भी कई बार सरकार की आलोचना की जाती रही है, प्रायः पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, सिविल सेवकों और शिक्षाविदों आदि को सदस्य के तौर पर नियुक्त किया जाता था, किंतु अब अधिकतर नियुक्तियाँ किसी एक दल विशिष्ट से जुड़े सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की होती हैं।

मानव संसाधन की कमी: अल्पसंख्यक आयोग वर्षों से मानव संसाधन के अभाव में कार्य कर रहा है, जिसके कारण आयोग का कार्य प्रभावित होता है और आयोग के समक्ष लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

प्रौद्योगिकी का अल्प उपयोग: अल्पसंख्यक आयोग में आज भी मामलों की जाँच करने के लिये आधुनिक प्रौद्योगिकी के स्थान पर पारंपरिक तरीकों का प्रयोग किया जाता है, जिसके कारण न केवल समय और पैसों की बर्बादी होती है, बल्कि इससे मामलों के निपटान में भी काफी समय लगता है।

संवैधानिक दर्जे की मांग 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये बनाए गए राष्ट्रीय आयोग के विपरीत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक संवैधानिक निकाय नहीं है, बल्कि इसे वर्ष 1992 में संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था।

प्रायः किसी संवैधानिक निकाय में निहित शक्ति और अधिकार किसी सांविधिक निकाय में निहित शक्तियों और अधिकारों से बहुत अलग होते हैं।

संवैधानिक निकायों के पास अधिक स्वायत्तता है और वे कई मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए उसकी जाँच कर सकते हैं।

हालाँकि सभी सांविधिक निकाय भी एक जैसे नहीं होते हैं, उदाहरण के लिये राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NMC) से अधिक शक्तियाँ हैं।

यही कारण है कि समय-समय पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NMC) को और अधिक शक्तियाँ प्रदान करने तथा इसे संवैधानिक दर्जा देने की बात की जाती रही है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस









एस ए बेताब

लेखक दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की मुस्लिम एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं

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