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“छला समर्पण”(एक सच्ची कहानी)



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यह कहानी खुली छोड़ दी गई है, ताकि पाठक सोच सके —
क्या कभी छोटे भाई, माता- पिता और बहनें उस त्याग को समझेंगे?
या यह भी एक ऐसी कहानी होगी, जो सिर्फ पीपल के पत्तों की सरसराहट में सुनी जाएगी…

डॉ. सत्यवान सौरभ

घर के आँगन में पीपल का पुराना पेड़ खामोशी से खड़ा था। उसकी छाँव में खेलते हुए बीते साल जैसे किसी पुराने संदूक में बंद पड़े थे। इस घर की दीवारों ने न जाने कितनी कहानियाँ देखी थीं — हँसी की, आँसुओं की, त्याग और उपेक्षा की।

बड़े बेटे ने महज़ छठी कक्षा से ही घर का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। पिता का स्वभाव ऐसा कि घर के कामों में कोई स्थायी हाथ बँटाना उनकी आदत में नहीं था। न कोई बड़ा सपना, न मेहनत से आगे बढ़ने की चाह। उस उम्र में, जब बाकी बच्चे अपनी पढ़ाई और खेलों में मग्न होते हैं, उसने ट्यूशन पढ़ाकर खुद की पढ़ाई भी पूरी की और छोटे भाई की भी।

बहनों की पढ़ाई के लिए जितना संभव हो सका, उसने पैसे जुटाए। कपड़े, किताबें, फीस — हर ज़रूरत में वह आगे खड़ा था। शादी के बाद उसकी पत्नी भी इस जिम्मेदारी में बराबर की साझेदार बनी। वह न सिर्फ अपने घर की जिम्मेदारी निभाती, बल्कि ननदों को उनके घर जाकर पढ़ाती, उन्हें अपने साथ कोचिंग ले जाती।

घर की छोटी-बड़ी ज़रूरतों के लिए बड़े की नौकरी और उसकी पत्नी के पैसों पर ही घर चलता रहा। पत्नी के फिक्स्ड डिपॉज़िट तक घर के खर्च में लग गए। जब उसकी पत्नी की भी नौकरी लगी, तब भी उनकी पूरी तनख्वाह घर की उन्नति में लगती रही।

कई सालों बाद बड़ा भाई नौकरी में स्थिर हुआ। उसने घर का सपना सजाया — नया मकान बनवाया, एक पुरानी गाड़ी खरीदी ताकि घर के काम आसानी से हों। लेकिन गाड़ी का इस्तेमाल भी ज्यादातर छोटा ही करता। यहाँ तक कि जब उसकी पत्नी गर्भवती थी, तब भी छोटा गाड़ी लेकर चला जाता और भाभी बस से ड्यूटी जाती। बड़ा भाई खुद किसी और के साथ काम पर जाता।

बड़े के बेटे के जन्म से पहले ही छोटे भाई की नौकरी लग चुकी थी। पर जिम्मेदारियों में हाथ बँटाने या घर का पुराना कर्ज़ चुकाने के बजाय वह अपने ही आराम में लगा रहा।

एक-दो बार बड़े ने माता-पिता से भी कहा कि छोटे की जरूरतों पर ध्यान दो, पर उसकी इच्छाओं को पंख मत लगाओ। मगर माता-पिता ने यह नहीं सोचा कि बड़ा सालों से परिवार का बोझ उठाए हुए है और अपना सब कुछ घर के लिए झोंक चुका है।

बड़ा भाई और भाभी हमेशा छोटे के लिए खुद से अच्छा ढूंढते और सोचते रहे — कपड़ों से लेकर पढ़ाई और सुविधा तक, हर बार उन्होंने पहले छोटे की ज़रूरत पूरी की। लेकिन माता-पिता और छोटे की इच्छाओं को कभी सब्र नहीं मिला; जो चाहा, तुरंत चाहिए था, चाहे उसके लिए बड़े का त्याग और मेहनत क्यों न कुर्बान हो।

बड़े भाई और उसकी पत्नी दोनों ड्यूटी करते और बच्चा पिता की गोद में पलता। इस वक्त भी न सास-ससुर, न बहनें और न ही छोटा भाई मदद को आगे आए।

कुछ समय बाद छोटे भाई की शादी हुई। उसकी पत्नी भी नौकरी में थी। घर के कर्ज़ को उतारने के बजाय दोनों ने नई गाड़ी खरीद ली। जबकि बड़े भाई की पत्नी को मायके से गाड़ी के लिए जो पैसे मिले थे, वे भी इस घर को आगे बढ़ाने में खर्च हो चुके थे।

सबसे चुभने वाली बात यह थी कि बहनों की पढ़ाई और ज़रूरतों के लिए सालों तक सबकुछ देने के बाद भी, वे छोटे भाई के पक्ष में रहीं। जैसे बड़े का हर त्याग, हर मेहनत किसी पुराने कपड़े की तरह बेमानी हो गया हो।

अब घर का माहौल बदल चुका था। छोटा भाई और उसकी पत्नी के बीच अहम का भाव बढ़ चुका था। बातें तानों में बदल गई थीं, और ताने अपमान में। कभी-कभी तो छोटे का गुस्सा हाथ तक पहुँच जाता। सास-ससुर भी इस पर चुप रहते।

बड़ा भाई अब अपने बेटे और पत्नी के साथ ही अपनी छोटी-सी दुनिया में सीमित हो चुका था। पर एक अजीब-सी खामोशी उसके भीतर घर कर गई थी — वह खामोशी, जो सिर्फ वही समझ सकता था, जिसने सालों तक दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे दिया हो और बदले में सिर्फ दूरी पाई हो।

दुख इस बात का नहीं था कि मेहनत का प्रतिफल नहीं मिला, बल्कि इस बात का था कि जिनके लिए जीवन का हर पल खपा दिया, उन्होंने ही मुंह मोड़ लिया। बड़े ने बहनों की पढ़ाई के लिए जो त्याग किया, उन्हें अपने घर तक पढ़ाया, वे भी चुपचाप छोटे के साथ खड़ी रहीं। बड़े के बेटे के जन्म के बाद भी किसी ने उसका ध्यान नहीं रखा — न दादी ने, न बुआओं ने, न चाचा-चाची ने।

समय का चक्र घूमता रहा, पर एक सच्चाई स्थिर रही — वह किशोर, जिसने छठी कक्षा से घर संभालना शुरू किया था, आज भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटा। बस अब उसने उम्मीद करना छोड़ दिया था।

एक रात, बरसों के घुटे हुए दर्द के बाद, उसने पत्नी से कहा —
“शायद गलती हमारी ही थी… हमने सोचा था कि खून का रिश्ता सबसे बड़ा होता है। पर असल में, समझ और सम्मान ही रिश्तों को जीवित रखते हैं।”

पत्नी ने बस उसका हाथ थाम लिया। आँसुओं से भरी आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक दृढ़ता थी —
“अब हम अपने बेटे को ये सिखाएँगे कि इंसानियत पहले, रिश्ते बाद में।”

आंगन में हवा चल रही थी। दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं। घर वही था, लोग वही थे, पर बड़ा भाई अब भीतर से बदल चुका था। वह जान चुका था कि त्याग का फल हमेशा आभार नहीं होता — कभी-कभी बस चुप्पी और दूरी मिलती है।

एक शाम, जब घर के आँगन में पीपल की पत्तियाँ सरसराईं, बड़ा भाई चुपचाप अपने बेटे को गोद में लेकर बैठा था। बेटा मासूमियत से पूछ बैठा —
“पापा, आप हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?”

बड़े ने हल्की मुस्कान दी, पर भीतर का दर्द आँखों में उतर आया। उसने बस इतना कहा —
“कभी-कभी बेटा, चुप रहना सबसे बड़ी ताकत होती है।”

पीपल का पेड़ उस शाम और भी स्थिर हो गया था। जैसे उसने भी यह वादा कर लिया हो कि वह इस घर के त्याग की छाया को हमेशा संजोकर रखेगा — चाहे लोग भूल जाएँ, पर हवा की हर सरसराहट में वह कहानी ज़िंदा रहेगी।

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यह कहानी खुली छोड़ दी गई है, ताकि पाठक सोच सके —
क्या कभी छोटे भाई, माता- पिता और बहनें उस त्याग को समझेंगे?
या यह भी एक ऐसी कहानी होगी, जो सिर्फ पीपल के पत्तों की सरसराहट में सुनी जाएगी…





- डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,
 हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381


-- Dr. Satyawan Saurabh,
Poet, freelance journalist and columnist,
All India Radio and TV panelist,
333, Pari Vatika, Kaushalya Bhavan, Barwa (Siwani) Bhiwani,
Haryana – 127045, Mobile :9466526148,01255281381


-- ਡਾ. ਸਤਿਆਵਾਨ ਸੌਰਭ,
ਕਵੀ, ਸੁਤੰਤਰ ਪੱਤਰਕਾਰ ਅਤੇ ਕਾਲਮਨਵੀਸ,
ਆਲ ਇੰਡੀਆ ਰੇਡੀਓ ਅਤੇ ਟੀਵੀ ਪੈਨਲਿਸਟ,
333, ਪਰੀ ਵਾਟਿਕਾ, ਕੌਸ਼ਲਿਆ ਭਵਨ, ਬਰਵਾ (ਸਿਵਾਨੀ) ਭਿਵਾਨੀ,
  ਹਰਿਆਣਾ - 127045, ਮੋਬਾਈਲ : 9466526148,01255281381


नोट- आपको प्रकाशनार्थ भेजी गई मेरी रचना/आलेख/ कविता/कहानी/लेख नितांत मौलिक और अप्रकाशित है।




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