सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

("ट्रांसफर का इंतज़ार: 9 साल, 9 बहाने") *हरियाणा में टीचर ट्रांसफर: सरकारी सिस्टम का अमर रोग* "हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर: वादा, बहाना और थकान"



"जब एक शिक्षक रोज़ 150 किलोमीटर सफर करता है, तो वह सिर्फ सड़क नहीं नापता—वह अपनी उम्र, अपने रिश्ते और अपने सपनों को भी नापता है।" हरियाणा की ट्रांसफर व्यवस्था वैसी ही है जैसे किसी घर में पुराना अलार्म घड़ी—जो साल में एक-दो बार सही बज जाती है, बाकी समय बस टिक-टिक करती रहती है। फर्क बस इतना है कि यहां गलती से भी अलार्म बज जाए, तो सरकार चौंककर कहती है—"अरे! यह तो अपने आप हो गया, अगली बार ध्यान रखेंगे कि जल्दी न हो।"

-डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर एक ऐसी बीमारी बन चुका है, जिसका कोई इलाज सरकार के पास नहीं, और शायद खोजने की कोशिश भी नहीं। यह बीमारी केवल प्रशासनिक फाइलों में नहीं, बल्कि हजारों शिक्षकों के दिलों, दिमाग और घरों में पसरी हुई है। बीते नौ साल से इसका लक्षण एक ही है—वादा, तारीख, बहाना, फिर नई तारीख, और फिर एक और बहाना। सरकारें आती-जाती रहीं, चेहरों पर बदलाव होता रहा, पर इस बीमारी की आदत नहीं बदली।

सरकार के लिए यह सिर्फ एक प्रक्रिया है—कंप्यूटर के एमआईएस पोर्टल पर एक क्लिक, किसी फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल पर रखना। लेकिन एक शिक्षक के लिए ट्रांसफर का मतलब है—हर दिन 80-150 किलोमीटर का सफर खत्म होना, बीमार माता-पिता के पास लौटना, बच्चों की हंसी सुनना, या बीमार जीवनसाथी का हाथ पकड़ना। यह उसकी जीवन की दिशा तय कर सकता है, लेकिन सरकारी दृष्टि में यह बस एक “पेंडिंग केस” है, जो किसी दिन निपटा दिया जाएगा।

इस बीमारी का इलाज ढूंढने की जगह सरकार ने बहानों की एक स्थायी दुकान खोल रखी है। कभी  एमआईएस पोर्टल में गड़बड़ी, कभी डेटा में विसंगति, कभी प्रक्रिया स्थगित, कभी चुनाव आचार संहिता, कभी मिड-सेशन का बहाना, तो कभी मॉडल संस्कृति स्कूलों के टेस्ट—और फिर उन्हें भूल जाना। बहानों की यह लिस्ट इतनी लंबी हो चुकी है कि अब कोई नया बहाना खोजने की भी जरूरत नहीं पड़ती—पुराने बहाने ही नए पैक में पेश कर दिए जाते हैं, जैसे पुराने अनाज में नया लेबल चिपका देना।

पिछले दिसंबर में नई सरकार आई तो शिक्षकों में उम्मीद की लौ जली। कहा गया—"कुछ हफ्तों में ट्रांसफर हो जाएंगे।" शिक्षकों ने राहत की सांस ली। मार्च आया—"थोड़ा इंतज़ार करें"। मई—"अब जल्दी करेंगे"। जून, जुलाई, अगस्त—हर बार नया वादा, वही बहाना। नई सरकार ने पुराने बहाने ही नए पैकेजिंग में बेच दिए। बस डायलॉग बदल गए, नीयत वही रही।

शायद सरकार के अफसर मानते हैं कि रोज़ 80–150 किलोमीटर का सफर करने वाले शिक्षक किसी “फिटनेस मिशन” का हिस्सा हैं। सुबह 5 बजे घर से निकलना, बीएलओ ड्यूटी, पीपीपी अपडेट, मिड-डे मील का हिसाब, एक साथ तीन कक्षाओं को पढ़ाना—सरकार की नज़र में यह “वर्कआउट” है। यह अलग बात है कि इस वर्कआउट में शिक्षक की कमर और घुटने पहले जवाब दे देते हैं, फिर मन और आत्मा।

घर अब रविवार का ठिकाना बन चुका है। बच्चों की हंसी, माँ की दवाई, घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां—सब सिर्फ “सोच” में रह जाती हैं। जब शिक्षक खुद अपने बच्चों से दूर रहकर दूसरों के बच्चों को पढ़ाता है, तो यह त्याग है या मजबूरी? सरकार इसे त्याग कहकर अपनी पीठ थपथपा लेती है, लेकिन यह सच में किसी का दिल तोड़ने वाला मजबूरी का जीवन है।

संवेदनशीलता किस मंत्रालय के अधीन आती है, शायद किसी को याद नहीं। सरकारी फाइलों में ट्रांसफर बस एक डेटा कॉलम का बदलाव है, लेकिन असल में यह किसी इंसान की मानसिक शांति, पारिवारिक स्थिरता और पेशेवर प्रदर्शन का आधार है। लेकिन इन बातों का कोई कॉलम एमआईएस पोर्टल पर नहीं होता, इसलिए इनकी कोई अहमियत भी नहीं।

सरकारी जवाब हमेशा तय होता है—"जल्दी होंगे, सिस्टम पर काम चल रहा है।" यह वही "जल्दी" है जिसमें 9 महीने में बच्चा पैदा हो जाता है, पर ट्रांसफर का फाइल पोर्टल से बाहर नहीं निकलता। सच तो यह है कि ट्रांसफर का बटन तभी दबता है, जब राजनीति को उसका फायदा हो। चुनाव नज़दीक आएं या किसी खास वोट बैंक को खुश करना हो, तभी प्रक्रिया अचानक तेज़ हो जाती है। बाकी समय, "तकनीकी कारणों" के ताले में शिक्षक की जिंदगी कैद रहती है।

यह समझना होगा कि शिक्षक मशीन नहीं है। उसके पास भी भावनाएँ हैं, थकावट है, परिवार है, सपने हैं। जब सरकार उसकी परेशानियों को "व्यक्तिगत" कहकर टाल देती है, तो वह केवल हतोत्साहित नहीं होता—वह धीरे-धीरे टूटने लगता है। और एक टूटा हुआ शिक्षक सिर्फ अपना मनोबल नहीं खोता, बल्कि आने वाली पीढ़ी के सपनों को भी कमजोर कर देता है।

ट्रांसफर कोई “फेवर” नहीं, बल्कि अधिकार है। इसे एक पारदर्शी, समयबद्ध और संवेदनशील प्रक्रिया में किया जाना चाहिए। परिवार, स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। तकनीकी गड़बड़ियों और बहानों की यह पुरानी आदत खत्म होनी चाहिए।

हरियाणा की ट्रांसफर व्यवस्था उस पुराने हैंडपंप जैसी है, जो कभी पानी देता है, कभी नहीं। जब पानी आता है, लोग कहते हैं—"देखो, काम कर रहा है।" और जब नहीं आता, तो कहते हैं—"पाइपलाइन ठीक हो रही है, इंतज़ार करो।" सवाल है—कब तक शिक्षक अपनी जिंदगी इस सूखी पाइपलाइन के भरोसे गुज़ारेंगे?

ट्रांसफर में देरी कोई तकनीकी गलती नहीं—यह संवेदनशीलता की कमी है। जब तक सरकार यह नहीं समझेगी कि शिक्षक भी इंसान है, तब तक यह रोग अमर रहेगा। नई सरकारें पुराने इलाज को नए नाम से बेचती रहेंगी, और मरीज—यानि शिक्षक—दिन-ब-दिन कमजोर होता जाएगा।

शिक्षक का पद सम्मानित है, लेकिन यह सम्मान सिर्फ मंच पर भाषणों में नहीं, उनके जीवन में भी दिखना चाहिए। जब शिक्षक घर लौटकर अपने बच्चों के साथ खाना खा सके, बीमार माता-पिता की सेवा कर सके, या जीवनसाथी का हाथ पकड़कर मुश्किल वक्त में खड़ा रह सके, तभी शिक्षा का असली मूल्य बनेगा। वरना, हम बस आंकड़ों में “शिक्षक संतुष्टि” लिखते रहेंगे, और हकीकत में वे भीतर से खाली होते जाएंगे।

सरकार को अब सिर्फ नीति नहीं, नीयत भी बदलनी होगी। सिस्टम को यह मानना होगा कि शिक्षक कोई संसाधन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा हैं। और जब आत्मा को रोज़-रोज़ थकाकर, तोड़कर, दूर रखकर जिंदा रखने की कोशिश की जाती है, तो न समाज बचता है, न शिक्षा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

india consists a number of ethnic groups sustaining diversity as its Core element .

 india consists a number of ethnic groups  sustaining  diversity as its Core element . Its quality may be summarized by  a simple illustration,  just a garden consist multiple colored flowers . Generally if a person is presented  a rose flower daily , with the passing of time he must express  his eager desire to have fragrant of another kind of flowers . So the diversity is the natural gift of God that’s reason in fact diversity is the beauty of india in the whole universe & the best example of good mankind which maintain several kinds of human taste . Indeed it calls for / invokes each Indian  to feel proud to be inhabitants of such diversified country .  Naturally diversity plays an  important role in the field of politics as well for the purpose of Governance which requires elected or chosen political Members in the Democratic system which is in force in our country as well who could lead its contribution by playing political role...

*EVM नये-छोटे-दलों का तथा BSP का उदय केंद्र मे नहीं होने दे रहा है*

(1)-पंडित पुजारी कि पार्टी काँग्रेस-BJP के नाटकीय नूरा-कुश्ती के खेल से 99% लोग अंजान है एक तरफ राहुल गाँधी भारत-जोड़ो-यात्रा का ढोंग कर रहे है तो दूसरी तरफ खडगे और शशी थरूर मे टक्कर दिखाकर खडगे (दलित) को काँग्रेस का अध्यक्ष बनाकर RSS-BJP कि जननी काँग्रेस BSP/भीमवादी दलित शेरनी बहन मायावती जी को शिकस्त देने के लिए दाँव-पेंच खेली है तथा इन बुद्ध के शूद्रो पर जो आज के MUSLIM SC ST OBC वंचित हजारों कलाकार जाति पेशेवर जाति वाले कामगार-श्रमिक-मजदूर-बहुजन लोग है इन्हे राजनीति के क्षेत्र में नपुंसक व अपाहिज बनाने के लिए जबरजस्त बेहतरीन चाल भी चली है इसलिए अम्बेडकर-वादी छुट भैये अवसर-वादी निकम्मा न बनकर 'भीमवादी-बनो' बहुजन हसरत पार्टी BHP कि बात पर तर्क करो गलत लगे तो देशहित-जनहित मे माफ करो* *(2)-जब-जब BSP को तोड़ा गया तब-तब Muslim Sc St Obc बुद्ध के शूद्र वंचित हजारों कलाकार जाति पेशेवर जाति वाले कामगार-श्रमिक-मजदूर-बहुजन लोगो ने उसके अगले ही चुनाव में BSP को 3-गुना ज्यादा ताकतवर बनाकर खड़ा किया है जैसे-1993/1995/1997 व 2002-03 में BSP को अ-संवैधानिक तरीके से तोड़कर समाजवादी पार्टी व BJP...

जर्जर स्कूल, खतरे में भविष्यटूटी छतों और दीवारों के बीच कैसे पलेगी शिक्षा की नींव?

भारत में लाखों सरकारी विद्यालय जर्जर हालत में हैं। टूटी छतें, दरारों वाली दीवारें, पानी व शौचालय का अभाव—ये बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई दोनों पर खतरा हैं। पिछले नौ वर्षों में 89 हज़ार सरकारी स्कूल बंद हुए, जिससे शिक्षा में अमीर-गरीब की खाई और गहरी हुई। शिक्षा का अधिकार कानून सुरक्षित भवन की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है। सरकार, समाज और नागरिकों को मिलकर विद्यालय भवनों की मरम्मत और सुविधाओं में निवेश करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ मलबों पर नहीं, मजबूत नींव पर अपने सपने खड़ी कर सकें। -डॉ. सत्यवान सौरभ शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और विद्यालय उसके मंदिर। यह वह स्थान है जहाँ बच्चों के सपनों को आकार मिलता है, विचारों को पंख मिलते हैं और भविष्य की नींव रखी जाती है। परंतु दुख की बात है कि भारत में, विशेषकर ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में, इन मंदिरों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। अनेक विद्यालयों में छतें टूटी हुई हैं, दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें हैं, बरसात में पानी टपकता है, खिड़कियाँ टूटी हुई हैं, बेंच जर्जर हो चुकी हैं और पीने के पानी तथा शौचालय...