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"प्रसवोत्तर देखभाल: माँ का साथ सास से ज्यादा कारगर""माँ की गोद में मिलती सुरक्षा, सास की भूमिका पर उठे सवाल"

"प्रसवोत्तर देखभाल: माँ का साथ सास से ज्यादा कारगर"

"माँ की गोद में मिलती सुरक्षा, सास की भूमिका पर उठे सवाल"

अध्ययन बताते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं की देखभाल करने में सास की तुलना में उनकी अपनी माँ कहीं अधिक सक्रिय और संवेदनशील रहती हैं। लगभग 70 प्रतिशत प्रसूताओं को नानी से बेहतर सहयोग मिला, जबकि मात्र 16 प्रतिशत को सास से सहायता मिली। यह बदलाव संयुक्त परिवारों के टूटने और आधुनिक सोच का परिणाम है। नानी का भावनात्मक जुड़ाव और मातृत्व का अनुभव बेटी के लिए सहारा बनता है। हालांकि सास की भूमिका कमजोर पड़ना पारिवारिक संतुलन के लिए चुनौती है। ज़रूरी है कि माँ और सास दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाएँ।



- डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय समाज में परिवार की भूमिका जीवन के हर पड़ाव पर महत्वपूर्ण होती है। जब घर में नया जीवन जन्म लेता है, तब यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।  प्रसव एक ऐसा समय है जब महिला शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर होती है। उसे सिर्फ चिकित्सकीय सहायता ही नहीं, बल्कि गहरे स्तर पर देखभाल, सहारा और संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है। परंपरागत रूप से यह जिम्मेदारी संयुक्त परिवारों में सास की मानी जाती थी, लेकिन बदलते दौर और सामाजिक संरचना के कारण यह भूमिका अब धीरे-धीरे माँ यानी नानी की ओर स्थानांतरित हो रही है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि प्रसव के बाद महिलाओं को अपनी सास की तुलना में अपनी माँ से कहीं अधिक देखभाल और सहयोग मिलता है।

यह तथ्य कई स्तरों पर सोचने को मजबूर करता है। एक ओर यह माँ और बेटी के रिश्ते की गहराई और भावनात्मक मजबूती को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि सास जैसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महिला इस प्रक्रिया में पीछे क्यों रह गई है। अध्ययन में पाया गया कि प्रसवोत्तर देखभाल में लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं को उनकी अपनी माँ से सहयोग मिला, जबकि मात्र 16 प्रतिशत महिलाओं की देखभाल उनकी सास ने की। यह आँकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है।

बेटी और माँ का रिश्ता हमेशा से भरोसे और आत्मीयता पर आधारित रहा है। प्रसव के बाद महिला अपने जीवन के सबसे नाजुक दौर से गुजरती है। उसका शरीर थका हुआ और कमजोर होता है, मानसिक रूप से वह असुरक्षा और चिंता का सामना करती है। ऐसे समय में वह सबसे पहले अपनी माँ के पास सहजता से जाती है। माँ न केवल उसकी तकलीफ को तुरंत समझती है बल्कि धैर्य और प्यार से उसका मनोबल भी बढ़ाती है। हर माँ ने मातृत्व का अनुभव किया होता है, इसलिए उसे पता होता है कि उसकी बेटी किन शारीरिक और मानसिक अवस्थाओं से गुजर रही है। यही वजह है कि बेटी अपनी असली माँ की देखभाल को सबसे भरोसेमंद मानती है।

इसके विपरीत सास-बहू का रिश्ता भारतीय समाज में अक्सर औपचारिकताओं और अपेक्षाओं से घिरा होता है। बहू अपनी सास के सामने उतनी सहजता महसूस नहीं कर पाती। कई बार पीढ़ियों का अंतर भी इस दूरी को और बढ़ा देता है। सास का सोचने का तरीका पुराने अनुभवों पर आधारित होता है, जबकि आज की पीढ़ी की महिलाएँ आधुनिक चिकित्सा और नई जानकारी पर अधिक भरोसा करती हैं। जब बहू को लगे कि उसकी ज़रूरतों को पूरी तरह समझा नहीं जा रहा है, तो वह अपनी माँ की ओर झुक जाती है। यही वजह है कि प्रसव के समय सास की तुलना में नानी की भूमिका अधिक अहम दिखाई देती है।

इस बदलाव के पीछे एक और बड़ा कारण है संयुक्त परिवारों का टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना। पहले प्रसव के समय बहू अपने ससुराल में ही रहती थी और पूरे परिवार की महिलाएँ उसकी देखभाल करती थीं। सास इस देखभाल की मुख्य जिम्मेदार मानी जाती थी। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। अधिकतर बेटियाँ प्रसव के समय मायके चली जाती हैं। वहाँ नानी स्वाभाविक रूप से जिम्मेदारी संभाल लेती है। यह प्रथा समाज में इतनी गहराई से जड़ पकड़ चुकी है कि अब यह लगभग सामान्य मान ली जाती है।

यह बदलाव कई दृष्टियों से सकारात्मक भी है। प्रसव के बाद महिला को भावनात्मक सुरक्षा मिलना बहुत ज़रूरी है। जब उसके पास उसकी अपनी माँ होती है, तो उसे मानसिक सुकून मिलता है। कई शोध बताते हैं कि प्रसवोत्तर अवसाद का खतरा उन महिलाओं में कम होता है जिन्हें अपनी माँ से पर्याप्त सहयोग मिलता है। नानी के अनुभव का लाभ शिशु को भी मिलता है। शिशु को समय पर स्तनपान कराना, उसकी सफाई और टीकाकरण जैसे छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कामों में नानी की भूमिका बहुत कारगर साबित होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रवृत्ति माँ और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जब सास की भूमिका कमजोर पड़ती है तो परिवारिक संतुलन प्रभावित होता है। बहू और सास के रिश्ते में दूरी और बढ़ सकती है। यह दूरी सिर्फ देखभाल तक सीमित नहीं रहती बल्कि परिवार की सामंजस्यपूर्ण संस्कृति पर भी असर डाल सकती है। आखिरकार सास भी खुद कभी इस प्रक्रिया से गुज़री होती है और उसके अनुभव की अहमियत को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अगर उसका अनुभव और स्नेह इस प्रक्रिया में शामिल न हो, तो यह न केवल उसके लिए निराशाजनक होता है बल्कि बहू और शिशु दोनों उस सहयोग से वंचित रह जाते हैं जो उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा दे सकता है।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि प्रसवोत्तर देखभाल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर माँ और सास दोनों मिलकर इस दायित्व को निभाएँ, तो महिला को दोगुना सहयोग मिलेगा। यह स्थिति न केवल प्रसूता महिला के लिए बेहतर होगी बल्कि शिशु के लिए भी अधिक लाभकारी होगी। इसके अलावा, परिवार के भीतर रिश्तों की मिठास और विश्वास भी बढ़ेगा।

समाज को भी यह समझना होगा कि प्रसव जैसे समय में महिला को सिर्फ शारीरिक मदद ही नहीं बल्कि मानसिक सहारा और भावनात्मक सहयोग भी चाहिए। अगर महिला को लगे कि उसकी सास भी उसके दर्द और ज़रूरतों को समझती है, तो उसका आत्मविश्वास और बढ़ेगा। इसी तरह, अगर सास-बहू के बीच संवाद और विश्वास का रिश्ता मजबूत हो, तो देखभाल का संतुलन अपने आप स्थापित हो जाएगा।

आज जब स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं की पहुँच बढ़ रही है, तब परिवार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अस्पताल और डॉक्टर अपना काम कर सकते हैं, लेकिन प्रसवोत्तर देखभाल का असली दायित्व घर और परिवार पर ही रहता है। परिवार के भीतर यह जिम्मेदारी अगर संतुलित ढंग से बाँटी जाए तो इसका लाभ सीधा माँ और शिशु दोनों को मिलेगा।

इसलिए यह आवश्यक है कि इस विषय पर जागरूकता बढ़ाई जाए। परिवारों को समझाया जाए कि प्रसवोत्तर देखभाल किसी प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है—यह माँ बनाम सास की लड़ाई नहीं है। बल्कि यह माँ और सास दोनों का संयुक्त दायित्व है। दोनों का अनुभव और स्नेह मिलकर प्रसूता महिला को वह सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जिसकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

“सास से ज्यादा माँ की देखभाल बेहतर” यह शीर्षक समाज में एक बदलते रुझान का दर्पण है। यह रुझान बताता है कि प्रसव जैसे संवेदनशील समय में महिला अपनी असली माँ को ज़्यादा भरोसेमंद और सहयोगी मानती है। लेकिन आदर्श स्थिति वही होगी जब सास और माँ दोनों मिलकर यह जिम्मेदारी निभाएँ। यह न केवल प्रसूता महिला के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए अच्छा होगा, बल्कि शिशु की परवरिश और परिवारिक रिश्तों के सामंजस्य के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा। आखिरकार, स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु ही स्वस्थ समाज की नींव रखते हैं।

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