(काम करने का अधिकार अनिवार्य रूप से पूंजीवाद और कार्य नैतिकता से जुड़ा है, काम करने का अधिकार पूंजीपतियों के विरुद्ध शोषण का अधिकार है और यह पूरी तरह से उचित दृष्टिकोण है. यदि आप वास्तव में मानवता के भविष्य को देख रहे हैं, तो कोई संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं अपना सकते.)
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✍ प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, शाहपुर रोड, सामने कुम्हार धर्मशाला,
आर्य नगर, हिसार (हरियाणा)-125003
दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं महामारी की दोहरी मार से उबरने के लिए संघर्ष कर रही है, लॉकडाउन से बेरोजगारी बढ़ रही है. मगर बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति को सक्षम करने के लिए और बुनियादी आवश्यकताओं के लिए काम चाहिए. 'काम करने का अधिकार' जीवन को जीने में सक्षम होने के लिए सबसे आवश्यक तत्व है. 'काम करने का अधिकार' शब्द अक्सर बेरोजगारी या काम की उपलब्धता की कमी के संदर्भ में उपयोग किया जाता है. भारत में, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, नौकरियों का वादा और बेरोजगारी की राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद काम का अधिकार चर्चा का एक बड़ा विषय था, और मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों में काम करने का अधिकार शामिल है. भारत में, हमें काम करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है. लेकिन हमारे पास जो है वह मनरेगा है. यह काम करने के अधिकार की दिशा में एक कदम है, लेकिन यह एक वैधानिक अधिकार है. मनरेगा के तहत, एक व्यक्ति बेरोजगारी भत्ते की मांग करके अधिकार को पूरा नहीं करने के लिए राज्य को जिम्मेदार ठहरा सकता है. मनरेगा के तहत, कोई व्यक्ति राज्य को मांग के आधार पर अधिकार को पूरा नहीं करने के लिए जिम्मेदार ठहरा सकता है.
भारत में जीडीपी के अनुपात में गिरावट देखी जा रही है, और ज्यादातर बेरोजगार वृद्धि, श्रम के साथ बाजार के कानूनों से जुडी है. इन परिस्थितियों में यह अधिकार महत्वपूर्ण हो जाता है. 'काम का अधिकार' शब्द अक्सर बेरोजगारी या काम की उपलब्धता की कमी के संदर्भ में उपयोग किया जाता है. लेकिन इसका एक और अर्थ भी है, जो बिना किसी बाधा के मेरी आजीविका कमाने का अधिकार है. एक तरफ, विस्थापन और फैलाव, और दूसरी तरफ, नई नौकरियां पैदा करने में विफलता ने रचनात्मक तरीके से काम करने के अधिकार की कल्पना करना और इसे कानूनी रूप से लागू करने के लिए और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है.
भारत जैसे देश में अधिक से अधिक स्वचालन से बेरोजगारी बढ़ने की संभावना है. सरकार ने श्रम संगठनों के पास 44 श्रम कानूनों को चार श्रम कानूनों में काट दिया है. श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करने के रूप में आलोचना की गई. भारत में सुरक्षात्मक श्रम कानून श्रम बल के एक छोटे समूह के लिए लागू होते है. बाकी लोगों के लिए, कानूनी सुरक्षा बहुत कम है, जो सुरक्षा के बारे में बहुत कम जागरूकता और कमजोर कार्यान्वयन है. भारत में सुरक्षात्मक श्रम कानून मौजूद हैं, वे स्थायी सरकारी नौकरियों में लोगों को श्रम बल के ऋणात्मक अधिकार के लिए लागू करते हैं. इसलिए, राज्य की क्षमता में बाधाओं को देखते हुए, जब यह श्रम कानूनों को लागू करने की बात आती है, श्रम बाजार को मजबूत करना यह सुनिश्चित करने का एक शानदार तरीका है कि श्रमिकों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए. एक अच्छा रोजगार गारंटी कार्यक्रम जहां तक काम में 'अधिकार' का सवाल है. यह स्वचालित रूप से श्रमिकों के बेहतर उपचार के लिए स्थितियां बनाता है.
यहां मनरेगा के साथ नए रोजगार के अवसर सृजित करने का विचार है, ताकि जो लोग बेरोजगार हैं, उन्हें रोजगार प्राप्त हो सके और वे सम्मानजनक जीवन जी सकें. इस गरिमा को काम की परिस्थितियों से माना जाता है, जैसे कि उचित वेतन का भुगतान किया जाना और काम के घंटे को विनियमित करना, और इस काम का उपयोग वे उपयोगी चीजें जैसे कि स्कूल की इमारतों की मरम्मत, सफाई पार्क, और इसी तरह से करते हैं. शहरी स्थानीय निकाय प्रमाणित सार्वजनिक संस्थानों जैसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों को पूर्व-अनुमोदित कार्यों के लिए नौकरी के वाउचर जारी कर सकते हैं.
ये संस्थान केवल पूर्व निर्धारित कार्यों के लिए श्रम को किराए पर देने के लिए वाउचर का उपयोग कर सकते हैं - जैसे कि पेंटिंग स्कूल की इमारतें, टूटे फर्नीचर की मरम्मत आदि.
कौशल की एक पूरी श्रृंखला को समायोजित किया जा सकता है. इसलिए, यह एक काम करने योग्य एजेंडा है, लेकिन इसे काम करने योग्य बनाने के लिए हमें न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि राजकोषीय संसाधनों की भी आवश्यकता है. काम का अधिकार न केवल पर्याप्त काम की कमी के बारे में है, बल्कि आम तौर पर शहरी भारत में सार्वजनिक वस्तुओं और परिसंपत्तियों की गहन कमी है. इन सार्वजनिक वस्तुओं को प्रदान करना राज्य की ज़िम्मेदारी है, और इस अनिवार्यता को रोजगार सृजन कार्यक्रम के साथ जोड़ा जा सकता है, जैसे कि मगनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में करता है.
काम करने का अधिकार अनिवार्य रूप से पूंजीवाद और कार्य नैतिकता से जुड़ा है, काम करने का अधिकार पूंजीपतियों के विरुद्ध शोषण का अधिकार है और यह पूरी तरह से उचित दृष्टिकोण है. यदि आप वास्तव में मानवता के भविष्य को देख रहे हैं, तो कोई संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं अपना सकते. काम पूरा होना चाहिए, काम रचनात्मक होना चाहिए, और काम को अपनी जगह पर रखना होगा, विकेंद्रीकृत शहरी रोजगार और प्रशिक्षण मनरेगा के साथ, नए रोजगार के अवसर पैदा करने का विचार है ताकि जो लोग बेरोजगार आसानी से नियोजित हो सकते हैं और एक गरिमामय जीवन जी सकते हैं राज्य द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास जैसी बुनियादी सेवाएं प्रदान करके रोजगार उत्पन्न करना यह सुनिश्चित करने का एक शानदार तरीका है कि श्रमिकों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए.
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✍ प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, शाहपुर रोड, सामने कुम्हार धर्मशाला,
आर्य नगर, हिसार (हरियाणा)-125
india consists a number of ethnic groups sustaining diversity as its Core element . Its quality may be summarized by a simple illustration, just a garden consist multiple colored flowers . Generally if a person is presented a rose flower daily , with the passing of time he must express his eager desire to have fragrant of another kind of flowers . So the diversity is the natural gift of God that’s reason in fact diversity is the beauty of india in the whole universe & the best example of good mankind which maintain several kinds of human taste . Indeed it calls for / invokes each Indian to feel proud to be inhabitants of such diversified country . Naturally diversity plays an important role in the field of politics as well for the purpose of Governance which requires elected or chosen political Members in the Democratic system which is in force in our country as well who could lead its contribution by playing political role...

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