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एडवोकेट जितेंद्र पांचाल के तहसील स्तिथ प्रतिष्ठान पर विश्वकर्मा जयंती महोत्सव का आयोजन बहुत धूमधाम से मनाया गया

उत्तर प्रदेश विश्वकर्मा महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष एडवोकेट जितेंद्र पांचाल के तहसील स्तिथ प्रतिष्ठान पर विश्वकर्मा जयंती महोत्सव का आयोजन बहुत धूमधाम से मनाया गया l जिसमे जिला कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष गौरव भाटी बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता विक्रम सिंह त्यागी ने की जबकि संचालन कार्यक्रम संयोजक जितेंद्र पांचाल एडवोकेट ने किया l      कार्यक्रम का प्राम्भ भगवान विश्वकर्मा जी के चित्र पर दीप जलाकर किया गया l इस अवसर पर मुख्य अतिथि गौरव भाटी ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि "विश्वकर्मा समाज का इतिहास बहुत गौरव शाली रहा है तथा देश के विकास में विश्वकर्मा समाज का बहुत बड़ा योगदान हैं l उन्होंने कहा कि भगवान विश्वकर्मा आदि काल के अभियंता थे साथ कला कौशल के प्रणेता भी थे l       अति विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे पंडित माया प्रकाश शर्मा ने कहा कि भगवान विश्वकर्मा पूरी दुनिया के आराध्य है तथा इस दुनिया को सुंदर रूप देने का श्रेय उन्हें ही जाता है l  पुरुषोत्तम उपाध्याय दौराला, प्रशांत त्यागी, राकेश कुशव...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन नगर पालिका कार्यालय मे केक काटकर मनाया गया, पालिका कर्मचारियों को किया गया सम्मानित*

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत। भगवान विश्वकर्मा जयंती, सेवा पखवाड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में नगर पालिका कार्यालय में हवन पूजन और सम्मान समारोह आयोजित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में केक काटा गया। जनपद के प्रभारी मंत्री बलदेव सिंह औलख कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे। गर्मी सर्दी और भीषण बारिश के बीच शहर की सफाई व्यवस्था दुरुस्त रखने वाले कर्मचारियों को सम्मानित किया गया। बुधवार सुबह नगर पालिका परिषद कार्यालय में जलकल और निर्माण विभाग के संयुक्त तत्वावधान में भगवान विश्वकर्मा पूजन और हवन किया गया। अभियंताओं और स्टाफ ने यंत्रों का भी पूजन किया। पालिकाध्यक्ष डॉ आस्था अग्रवाल, प्रभारी मंत्री बलदेव सिंह औलख, भाजपा जिलाध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह, डीएम ज्ञानेंद्र सिंह, ईओ संजीव कुमार, पीसीयू चेयरमैन सुरेश गंगवार, एसडीएम श्रद्धा सिंह, रिटायर्ड कर्मचारी नेता नन्हेंलाल भाजपा जिला उपाध्यक्ष वरिष्ठ सभासद गोकुल प्रसाद मौर्य नगर अध्यक्ष इंद्रेश सिंह चौहान, गुरुभाग सिंह, अमित अग्रवाल, लेखराज भारती सतनाम सिंह, सहित सभ...

सपा ने पीलीभीत क्षेत्र के कस्बा जहानाबाद में पीडीए जनचर्चा पंचायत कार्यक्रम का आयोजन किया*

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देशानुसार 127 सदर विधानसभा पीलीभीत क्षेत्र के कस्बा जहानाबाद में सपा पीडीए जनचर्चा पंचायत कार्यक्रम का आयोजन किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता 127 सदर विधानसभा पीलीभीत अध्यक्ष हाजी इम्तियाज अल्वी साहब, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सपा जिलाध्यक्ष जगदेव सिंह जग्गा जी एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सपा जिला महासचिव नफीस अहमद अंसारी जी व सपा प्रदेश सचिव असलम जावेद अंसारी जी एवं कार्यक्रम का संचालन देवनन्दन प्रजापति जी ने किया l सपा जिला अध्यक्ष जगदेव सिंह जग्गा जी ने अपने संबोधन में कहा कि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री अखिलेश यादव के निर्देश पर प्रत्येक गांव में पीडीए जनचर्चा करने के साथ ही अपने-अपने बूथों पर मतदाता सूची को शुद्ध एवं दुरस्त कराने का काम शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर मतदाता सूची के लिए विशेष गहन पुनःनिरीक्षण (S.I.R) अथवा विशेष पुनिरीक्षण SSR का कार्य शुरू हो  जाएगा, इसके लिए बी एल ए की नियुक्ति फार्म आई डी बी एल ए 2 के लिए निर्धारित फॉर...

"प्रसवोत्तर देखभाल: माँ का साथ सास से ज्यादा कारगर""माँ की गोद में मिलती सुरक्षा, सास की भूमिका पर उठे सवाल"

"प्रसवोत्तर देखभाल: माँ का साथ सास से ज्यादा कारगर" "माँ की गोद में मिलती सुरक्षा, सास की भूमिका पर उठे सवाल" अध्ययन बताते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं की देखभाल करने में सास की तुलना में उनकी अपनी माँ कहीं अधिक सक्रिय और संवेदनशील रहती हैं। लगभग 70 प्रतिशत प्रसूताओं को नानी से बेहतर सहयोग मिला, जबकि मात्र 16 प्रतिशत को सास से सहायता मिली। यह बदलाव संयुक्त परिवारों के टूटने और आधुनिक सोच का परिणाम है। नानी का भावनात्मक जुड़ाव और मातृत्व का अनुभव बेटी के लिए सहारा बनता है। हालांकि सास की भूमिका कमजोर पड़ना पारिवारिक संतुलन के लिए चुनौती है। ज़रूरी है कि माँ और सास दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाएँ। - डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय समाज में परिवार की भूमिका जीवन के हर पड़ाव पर महत्वपूर्ण होती है। जब घर में नया जीवन जन्म लेता है, तब यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।  प्रसव एक ऐसा समय है जब महिला शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर होती है। उसे सिर्फ चिकित्सकीय सहायता ही नहीं, बल्कि गहरे स्तर पर देखभाल, सहारा और संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है। परंपरागत रूप से यह जिम्मेदार...

"पानी से नहीं, नीतियों से हारी ज़िंदगी"बार-बार दोहराई गई त्रासदी, बाढ़ प्रबंधन क्यों है अधूरा सपना?

हरियाणा और उत्तर भारत के कई राज्य बार-बार बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं, लेकिन हर बार नुकसान झेलने के बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल नज़र नहीं आती। 2023 की बाढ़ के बाद भी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नदियों की सफाई, नालों की निकासी और जल प्रबंधन की योजनाएं अधूरी पड़ी रहीं। नतीजा यह कि 2025 में एक बार फिर लाखों किसान अपनी मेहनत की फसल डूबते देख मजबूर हुए। सवाल यह है कि जब बाढ़ का खतरा बार-बार दस्तक देता है तो हमारी नीतियां क्यों स्थायी हल नहीं तलाश पातीं? - डॉ सत्यवान सौरभ हरियाणा में 2025 की बाढ़ कोई अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदा नहीं थी। यह वही त्रासदी है, जिसकी पुनरावृत्ति राज्य 1978, 1988, 1995, 2010 और हाल ही में 2023 में झेल चुका है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। केवल पिछले दो वर्षों में 657 करोड़ रुपये बाढ़ प्रबंधन पर खर्च किए गए, फिर भी इक्कीस जिलों के सैकड़ों गांव पानी में डूबे रहे, साढ़े चार लाख से अधिक किसानों की छब्बीस लाख एकड़ से ज्यादा फसल बर्बाद हो गई, हजारों परिवार बेघर हो गए और तेरह लोगों की जान चली गई। हर बार यह सवाल उठता है कि आखिर सरकारें और तंत्र क्यों एक ही गलत...

राष्ट्रीय साहित्यान्चल सम्मान हेतु डॉ. प्रियंका सौरभ और डॉ. सत्यवान सौरभ का चयन*“देश-विदेश में सक्रिय लेखन, 27 पुस्तकों के रचयिता साहित्यकार दंपत्ति का साहित्यान्चल सम्मान हेतु चयन”

(हिसार, सिवानी मंडी)  भीलवाड़ा, राजस्थान – औद्योगिक नगरी के साथ-साथ साहित्य साधना की धरा बन चुके भीलवाड़ा से एक  महत्वपूर्ण समाचार सामने आया है। साहित्यांचल संस्था द्वारा घोषित परिणामों में सिवानी मंडी के गाँव बड़वा के साहित्यकार दंपत्ति डॉ. प्रियंका सौरभ और डॉ. सत्यवान सौरभ का राष्ट्रीय स्तर के सम्मान हेतु चयन हुआ है। घोषित सूची के अनुसार, डॉ. प्रियंका सौरभ का चयन “सुशीला देवी खमेसरा राष्ट्रीय साहित्यांचल सम्मान” (₹5100) और डॉ. सत्यवान सौरभ का चयन “स्वरूप सिंह खमेसरा राष्ट्रीय साहित्यांचल सम्मान” (₹5100) के लिए किया गया है। यह दंपत्ति न केवल सक्रिय साहित्यकार हैं, बल्कि प्रतिदिन देश-विदेश के हज़ारों अख़बारों में विभिन्न भाषाओं में संपादकीय लेख लिखते हैं। डॉ. सत्यवान सौरभ की अब तक 17 पुस्तकें और डॉ. प्रियंका सौरभ की 10 पुस्तकें विभिन्न विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। संसमयिक विषयों पर लेखन के साथ-साथ दोनों कवि-लेखक कविता, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ और बाल कविताएँ भी रचते हैं, जिससे उनकी रचनात्मकता का व्यापक स्वरूप सामने आता है। दोनों ही राजनीति विज्ञान म...

हरियाणा की ड्रीम पॉलिसी: शिक्षक तबादलों के अधूरे सपनों की हकीकत?“शिक्षा सुधार का अधूरा सपना या केवल राजनीतिक नारा?”

सरकार ने घोषणा की थी कि इस वर्ष तबादले अप्रैल में होंगे, किंतु सितंबर तक भी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। यह देरी न केवल शिक्षकों के साथ वादाख़िलाफ़ी है, बल्कि छात्रों की पढ़ाई और विद्यालयों के संचालन पर भी सीधा आघात है। हरियाणा सरकार की “ड्रीम पॉलिसी” का उद्देश्य था शिक्षक तबादलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाना। शुरुआत में इसे क्रांतिकारी कदम माना गया, लेकिन अब बार-बार शेड्यूल में देरी, तकनीकी पेचीदगियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यह विवादों में घिर गई है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार ने केवल औपचारिकताएँ थोपकर वादाख़िलाफ़ी की है। इसका असर सीधे शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। यदि शीघ्र ठोस कार्रवाई न हुई तो यह नीति उपलब्धि न बनकर सरकार की विफलता का प्रतीक बन जाएगी। -डॉ. सत्यवान सौरभ हरियाणा सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुचारु बनाने के उद्देश्य से कुछ वर्ष पूर्व शिक्षक तबादलों के लिए ऑनलाइन प्रणाली लागू की थी, जिसे बड़े गर्व से “ड्रीम पॉलिसी” का नाम दिया गया। इस नीति को लागू करने का तात्पर्य यह था कि अब शिक्षकों के तबादले केवल वरिष्ठ...

परंपराओं से कटाव और समाज का विघटनवामपंथी सोच और भारतीय संस्कृति: समृद्धि या विकृति?- डॉ सत्यवान सौरभभारत, एक ऐसा देश जहां संस्कृति, धर्म, कला, और साहित्य की जड़ें सदियों से फैली हुई हैं, आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह देश विविधताओं में एकता का प्रतीक है, और इसकी सांस्कृतिक धरोहर विश्वभर में प्रशंसा पाती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज के कई पहलुओं पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। इस विचारधारा ने साहित्य, कला, शैक्षिक संस्थानों, और इतिहास के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति को चुनौती दी है। वामपंथी विचारधारा का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है, इसे समझने के लिए हमें इसके विभिन्न पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करना होगा।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय साहित्य और कला में आधुनिकता के नाम पर ऐसे बदलाव लाने की कोशिश की है, जो भारतीय समाज के पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ हैं। साहित्य और कला समाज की संवेदनाओं और मानसिकताओं को प्रकट करने का माध्यम होते हैं। साहित्यकारों और कलाकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे समाज को सही दिशा में मार्गदर्शन करें, न कि उसे भ्रमित करें। वामपंथी विचारकों ने साहित्य में अश्लीलता, विकृत मानसिकताओं और व्यक्तिगत संबंधों की विकृति को ‘आधुनिकता’ के नाम पर प्रस्तुत किया है। यह केवल समाज में नैतिकता की गिरावट का कारण नहीं बनता, बल्कि यह समाज में असंतुलन और असहमति की स्थिति भी उत्पन्न करता है।वामपंथी लेखकों ने भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपराओं को नकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उन्होंने देवी-देवताओं, धार्मिक परंपराओं और संस्कारों का मजाक उड़ाया, और इसे साहित्य में "आधुनिकता" के रूप में प्रस्तुत किया। जब साहित्यकार समाज की जड़ों से कटकर केवल पश्चिमी विचारधारा को अपनाते हैं, तो वे समाज के पारंपरिक मूल्यों और नैतिकताओं से दूर हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय साहित्य और कला में एक खोखली और विकृतता फैलने लगती है।वामपंथी विचारधारा ने कला के माध्यम से भी भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को चुनौती दी है। कलाकारों ने परंपरागत रूपों को छोड़कर आधुनिक कला को अपनाया, जो भारतीय संस्कृति और उसकी गहरी जड़ों से कटकर बाहरी प्रभावों को स्वीकार करता है। यही कारण है कि भारतीय कला में पारंपरिक रूपों की जगह पश्चिमी और वैश्विक विचारधारा का दबदबा बढ़ा है, जो भारतीय समाज के साथ न सुसंगत हैं।भारतीय शैक्षिक संस्थान, जहां युवा पीढ़ी अपनी शिक्षा प्राप्त करती है, वहां वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव है। कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वामपंथी विचारकों ने अपनी विचारधारा को छात्रों पर थोपने का प्रयास किया है। यह विचारधारा भारतीय समाज की वास्तविकता और संस्कृति से दूर होती है और कभी-कभी इसे विकृत रूप में प्रस्तुत करती है। छात्रों को यह सिखाने के बजाय कि भारतीय संस्कृति, धर्म, और परंपराओं की अपनी गहरी अहमियत है, इन संस्थानों में अक्सर उन्हें आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पेश किया जाता है। वामपंथी विचारधारा का यह प्रयास छात्रों में भ्रम और असंतुलन उत्पन्न करता है।वामपंथी विचारक भारतीय इतिहास को भी एक निश्चित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, जिसमें केवल नकारात्मक पक्षों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। जातिवाद, असमानताएँ, और सामंती व्यवस्था जैसी समस्याओं को तो बड़े पर्दे पर लाया जाता है, लेकिन भारतीय समाज में सहिष्णुता, प्रेम, और विविधता के पक्षों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब विद्यार्थियों को एकतरफा दृष्टिकोण से शिक्षा दी जाती है, तो वे भारतीय समाज की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक धरोहर को सही तरीके से नहीं समझ पाते। इसके परिणामस्वरूप, एक नई पीढ़ी को ऐसी शिक्षा मिलती है, जो समाज के बारे में एक पक्षीय और विकृत दृष्टिकोण अपनाती है।वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में, छात्र संगठनों ने भी भारतीय समाज और संस्कृति की आलोचना करना शुरू कर दिया है। विश्वविद्यालयों में आयोजित बहसों और विचार-विमर्शों में अक्सर यह देखा जाता है कि वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किसी भी कीमत पर भारतीय परंपराओं और धर्मों का मजाक उड़ाया जाता है। यह भारतीय समाज के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति की नींव को कमजोर करता है और समाज के भीतर असहमति उत्पन्न करता है।भारतीय इतिहास में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के अंधेरे पहलुओं को उजागर किया है, जैसे जातिवाद, सामंती व्यवस्था, और ब्रिटिश शासन की आलोचना। हालांकि, इन पहलुओं को नकारना नहीं चाहिए, लेकिन वामपंथी दृष्टिकोण भारतीय इतिहास को एकतरफा और विकृत रूप में प्रस्तुत करता है।वामपंथी इतिहासकार भारतीय धर्म, संस्कृति, और परंपराओं को आलोचना करते हैं और उन्हें तुच्छ रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने भारतीय समाज के असमानताओं और संघर्षों को ही प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया है और कभी भी भारतीय सभ्यता के सकारात्मक पहलुओं को महत्व नहीं दिया। भारतीय समाज में जिस प्रकार का सामूहिक प्रेम, सहिष्णुता, और अहिंसा का संदेश है, उसे वामपंथी इतिहासकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। इस दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास को एकतरफा रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति और समाज के वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर है।यह विडंबना है कि कुछ राष्ट्रवादी विचारक और नेता, जो पहले वामपंथी विचारधारा के आलोचक थे, अब उन्हें मंचों पर बुलाते हैं और उनके विचारों को अपनाने की कोशिश करते हैं। यह स्थिति भारतीय राजनीति के लिए खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इससे राष्ट्रवाद की असली भावना कमजोर हो जाती है। राष्ट्रवाद का उद्देश्य केवल भारतीय संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करना होना चाहिए, लेकिन जब ऐसे विचारक, जो पहले भारतीय धर्म और संस्कृति का मजाक उड़ाते थे, अब राष्ट्रवाद का चेहरा बनने की कोशिश करते हैं, तो यह स्थिति समाज में भ्रम उत्पन्न करती है।राष्ट्रवाद का वास्तविक उद्देश्य भारतीय समाज के सामूहिक हितों की रक्षा करना है, और इसके लिए हमें अपनी संस्कृति, धर्म, और परंपराओं की रक्षा करनी होगी। वामपंथी विचारक अब राष्ट्रवाद का हिस्सा बनकर अपने पुराने विचारों से पलायन कर रहे हैं, जिससे भारतीय समाज में एक नया भ्रम पैदा हो रहा है। जब राष्ट्रवादी विचारक वामपंथी विचारधारा को स्वीकारने की कोशिश करते हैं, तो यह राष्ट्रवाद की सच्चाई को कमजोर करता है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों को कमजोर किया है। भारतीय समाज में परिवार और रिश्ते केवल सामाजिक संस्थाएँ नहीं होते, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन वामपंथी विचारधारा ने इसे केवल एक सामाजिक संस्था के रूप में प्रस्तुत किया है, जो व्यक्तिगत स्वार्थ और अधिकारों पर आधारित है। यह दृष्टिकोण समाज में असंतुलन पैदा करता है और पारंपरिक परिवार व्यवस्था को कमजोर करता है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज में उन मूल्यों को भी नष्ट करने का प्रयास किया है, जो समाज के सामूहिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। जैसे कि भारतीय समाज में गुरू-शिष्य परंपरा, परिवार के प्रति समर्पण, और समाज के प्रति दायित्व की भावना अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। लेकिन वामपंथी विचारधारा ने इसे केवल एक "पारंपरिक" और "अहंकारी" दृष्टिकोण के रूप में पेश किया है, जिससे समाज में असंतुलन और असहमति की स्थिति उत्पन्न हो रही है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से कई विकृतियाँ फैलाई हैं। इस विचारधारा ने साहित्य, कला, शिक्षा और इतिहास के माध्यम से भारतीय संस्कृति और समाज के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय समाज की शक्ति और एकता केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक विश्वासों में ही निहित है। वामपंथी विचारधारा का विरोध करना हमारा कर्तव्य है, ताकि हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा कर सकें।अब समय आ गया है कि हम वामपंथी विचारों को पहचानें और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय कदम उठाएँ। यही हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी रहें और हमारे समाज की एकता और शक्ति बनी रहे।- डॉo सत्यवान सौरभ,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381-- Dr. Satyawan Saurabh,Poet, freelance journalist and columnist,All India Radio and TV panelist,333, Pari Vatika, Kaushalya Bhavan, Barwa (Siwani) Bhiwani,Haryana – 127045, Mobile :9466526148,01255281381-- ਡਾ. ਸਤਿਆਵਾਨ ਸੌਰਭ,ਕਵੀ, ਸੁਤੰਤਰ ਪੱਤਰਕਾਰ ਅਤੇ ਕਾਲਮਨਵੀਸ,ਆਲ ਇੰਡੀਆ ਰੇਡੀਓ ਅਤੇ ਟੀਵੀ ਪੈਨਲਿਸਟ,333, ਪਰੀ ਵਾਟਿਕਾ, ਕੌਸ਼ਲਿਆ ਭਵਨ, ਬਰਵਾ (ਸਿਵਾਨੀ) ਭਿਵਾਨੀ, ਹਰਿਆਣਾ - 127045, ਮੋਬਾਈਲ : 9466526148,01255281381नोट- आपको प्रकाशनार्थ भेजी गई मेरी रचना/आलेख/ कविता/कहानी/लेख नितांत मौलिक और अप्रकाशित है।

(सच्चे पुरस्कार का मूल्य) शिक्षक सम्मान: सच्चे समर्पण की पहचान और पारदर्शिता की आवश्यकता

सच्चे पुरस्कार का मूल्य उस कार्य में निहित है, जो किसी व्यक्ति ने समाज और समुदाय के लिए किया है। पुरस्कार का असली उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत पहचान या नौकरी बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, यह उन लोगों को सम्मानित करना चाहिए, जो समाज में सार्थक बदलाव लाने में सफल रहे हैं, चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो या किसी अन्य क्षेत्र में। ऐसे पुरस्कार समाज के वास्तविक विकास और भले के लिए होना चाहिए, न कि केवल एक व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक। - डॉ. प्रियंका सौरभ शिक्षक सम्मान, जो हमेशा से समाज में एक उच्च स्थान प्राप्त है, आजकल कुछ बदलावों का सामना कर रहा है। शिक्षा के प्रति कुछ शिक्षकों का जूनून और उनका समर्पण वाकई शिक्षा की नींव को मजबूत करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया ट्रेंड देखने को मिला है—"गैर सरकारी संगठन" द्वारा शिक्षकों को सम्मानित करने की प्रक्रिया। जहां एक ओर यह कदम सराहनीय है, वहीं दूसरी ओर इसमें पक्षपात और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का भी असर देखा जा रहा है। विद्यालयों या महाविद्यालयों के प्रिंसिपल द्वारा नाम लेने के दौरान अक्सर यह देखा गया है कि कु...

दुर्गेश की हत्या जातीय विद्वेष का नतीजा, दोषियों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएदलित युवक दुर्गेश कुमार की हत्या के बाद किसान नेताओं ने मृतक के परिजनों से मुलाक़ात की

आजमगढ़ 10 सितम्बर 2025. दलित युवक दुर्गेश कुमार की हत्या के बाद सोशलिस्ट किसान सभा और किसान एकता समिति के प्रतिनिधि मंडल ने मृतक के परिजनों से नौशेरा, जीयनपुर में मुलाक़ात की. प्रतिनिधि मंडल में किसान नेता राजीव यादव, महेन्द्र यादव, साहबदीन, नन्दलाल यादव शामिल थे.  प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि दुर्गेश कुमार की हत्या जातीय विद्वेष का नतीजा है. दोषियों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की जाए, जिससे सामंती ताकतों की इतनी हिम्मत न हो कि किसी दलित युवक को पीट-पीटकर मार डालें. मृतक के पिता इंदल राम ने बताया कि 25 तारीख़ को गणेश यादव सात-आठ लोगों के साथ आकर धमकी दिए थे. लड़की से बात करने का मामला था. इससे स्पष्ट है कि हत्या पूर्वनियोजित थी.  दुर्गेश के पिता बार-बार कहते हुए अचेत हो जा रहे थे कि वह साढ़े पांच फुट का था. उन्होंने बताया कि घर से उसे बुलाकर पीट-पीटकर मारा और जब उनका बेटा दर्द से कराह रहा था तो दर्द कम करने के नाम पर दवा कहकर जबरदस्ती जहर पिला दिया. दुर्गेश ने फोन पर और जब उसको अस्पताल ले जा रहे थे तो कितनी बेरहमी से उसे पीटा गया बताते हुए बार-बार कह रहा था कि उसकी जान ब...

राज्यमंत्री/प्रभारी मंत्री बलदेव सिंह औलख ने बाढ़ पीड़ितों को वितरित की राशन किट।

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत राज्यमंत्री/जनपद के प्रभारी मंत्री कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग उ0प्र0 बलदेव सिंह औलख के साथ जिलाध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह व जिलाधिकारी ज्ञानेन्द्र सिंह ने तहसील अमरिया क्षेत्रान्तर्गत जोशी कालोनी व टांडा विजैसी में पहुंचकर बाढ़ पीड़ितों को खाद्यान्न किट व तिरपाल वितरित की। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित लोगों से बातचीत की उनका हाल जाना व उनकी समस्याओं को सुना।  मा0 मंत्री जी ने खाद्यान्न किट में उपलब्ध सामान की जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में हमसब का कर्तव्य है कि बाढ़ पीडितों की मदद करने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही राजस्व टीम द्वारा किसानों की फसलों की हुई क्षति का आंकलन किया जायेगा और किसानों को मुआवजा दिया जायेगा।   जिलाधिकारी ने कहा कि बाढ़ से प्रभावित लोगों के घर तक राशन किट पहुंचायी जा रही है। उन्होंने कहा कि बाढ़ से प्रभावित ग्रामों में एडीएम/एसडीएम सहित विभिन्न टीमें मौके पर पहुंचकर बाढ़ पीड़ितों की लगातार मदद कर रही है।  उन्होंने कहा कि बाढ़ से प्रभावित ग्रामों में एंटी लार्वा...

भारतीय रणनीति और पड़ोसी देशों की उथल-पुथलदक्षिण एशिया की अस्थिरता और भारत की चुनौतियाँ

दक्षिण एशिया इस समय राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव में हालिया घटनाओं ने भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर सीधा प्रभाव डाला है। चीन और अमेरिका अपनी-अपनी टूलकिट के जरिए क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं। भारत के लिए केवल प्रतिक्रियात्मक नीति पर्याप्त नहीं है; उसे कूटनीतिक सक्रियता, आर्थिक निवेश, सुरक्षा सहयोग और सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत करना होगा। साथ ही आंतरिक एकजुटता को बनाए रखना अनिवार्य है। भारत अब मूकदर्शक नहीं रह सकता; उसे निर्णायक भूमिका निभाकर क्षेत्रीय स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को सुरक्षित करना होगा। ✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ दक्षिण एशिया आज जिस अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, वह केवल स्थानीय राजनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्तियों के गहरे हस्तक्षेप का दुष्परिणाम भी है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों में हाल के वर्षों में जिस तरह राजनीतिक हलचलें और जनआंदोलन सामने आए हैं, उन्होंने पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। नेपाल में युवाओं की भीड़ का संसद पर धावा, बांग्लादेश में सरकार के खिल...

पंचायत का ऐतिहासिक फैसला : लोगों पर अत्याचार करने वाले दो भाईयों को किया कुरैशी बिरादरी से‌ निष्कासित।

Report By:Anita Devi  देवरनियां के मुंडिया जागीर में कुरैशी बिरादरी की बैठक में हुआ फैसला। जानलेवा हमले में बिरादरी से निष्कासित दोनों भाईयों समेत चार पर हुए हैं नामजद। पुलिस की रैड, आरोपी फरार। देवरनियां। लोगों पर जुल्म- अत्याचार करने वालों पर कानून का शिकंजा कसने के अलावा बिरादरी का शिकंजा कसने लगा है। नगर पंचायत देवरनियां के कस्बा मुंडिया जागीर में कुरैशी बिरादरी के लोगों पर जुल्म करने वाले दो सगे भाईयों को पूरे परिवार के साथ बिरादरी से निष्कासित करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है। कस्बा मुंडिया जागीर निवासी अशरफ कुरैशी, रहीसा कुरैशी दोनों सगे भाईयों के अलावा रहीसा कुरैशी के पुत्र इस्लाम कुरैशी  और  अलीम कुरैशी पर मुंडिया जागीर निवासी मोहम्मद आसिफ ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि  उक्त लोगों ने उस पर जानलेवा हमला किया है, जिससे वह बाल-बाल बच गया। इस रिपोर्ट के बाद सी.ओ बहेड़ी व  देवरनियां कोतवाली पुलिस ने आरोपियों के घर रैड मारी थी, मगर वह हत्थे नहीं चढे।  ... कुरैशी बिरादरी का ऐतिहासिक फैसला। सोमवार रात कुरैशी बिरादरी की बैठक मुंडिया...

सपा युवा इकाई युवजन सभा में संगठन विस्तार में ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने मोहम्मद फैज़ अंसारी को पुनः ज़िला उपाध्यक्ष नियुक्त किया*

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत। समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में संगठन विस्तार की प्रक्रिया के तहत ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने  मोहम्मद फैज़ अंसारी 'शानू' को पुनः ज़िला उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति की घोषणा के साथ ही कार्यकर्ताओं में हर्ष का माहौल है। मोहम्मद फैज़ अंसारी लंबे समय से समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं और पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संगठन के विभिन्न कार्यक्रमों, आंदोलनों और सामाजिक सरोकारों में उनकी सक्रिय उपस्थिति ने युवाओं के बीच उन्हें एक लोकप्रिय चेहरा बना दिया है। इस अवसर पर ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने कहा कि फैज़ अंसारी शानू ने हमेशा पार्टी के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखते हुए कार्य किया है। युवाओं को जोड़ने और समाजवादी विचारधारा को मज़बूती देने में उनकी भूमिका सराहनीय है। हमें पूरा विश्वास है कि आगे भी वे इसी तरह संगठन को मज़बूत करेंगे। नियुक्ति पर मोहम्मद फैज़ अंसारी ने ज़िला अध्यक्ष सहित संपूर्ण नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मैं संगठन को और अधिक...

संगम फाउंडेशन व हिंदी उर्दू मंच के संयुक्त तत्वावधान में एक शानदार नातिया मुशायरा हुआ*

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत: संगम फाउंडेशन व हिंदी उर्दू मंच के संयुक्त तत्वावधान में एक शानदार नातिया मुशायरा जश्ने ईद मिलादुन्नबी के  सिलसिले में  हाजी ज़हीर अनवर की सरपरस्ती में ग्रेस पब्लिक स्कूल ख़ुदा गंज में आयोजित किया गया जिसकी *सदारत मौलाना मुफ्ती हसन मियां क़दीरी* ने की, निज़ामत का कार्य ज़ियाउद्दीन ज़िया एडवोकेट ने किया जनाबे सदर हसन मियां कदीरी ने अपने कलाम मे कहा जलवाए हुस्ने इलाही प्यारे आका की है जात,रुख से रोशन दिन हैं उन के जुल्फ़ का सदका है रात मुशायरा कनवीनर मुजीब साहिल ने यूं फरमाया दिल के बोसीदा ज़ख्म सीने को इश्क  वाले  चले  मदीने   को हाशिम नाज़ ने अपनी नात पढ़ते हुए कहा बिना ज़िक्रे नबी मेरी कोई पहचान थोड़ी है,कि नाते मुस्तफा लिखना कोई आसान थोड़ी है नाजिम नजमी ने अपने कलाम में यूं कहा सुकूने दिल नहीं मिलता उसे सारे जमाने में बुलालो अबतो आका मुझ को अपने आस्ताने में हर सिमत यहां बारिशे अनवारे नबी है उस्ताद शायर शाद पीलीभीती ने अपने मखसूस अंदाज में कहा  बन के अबरे करम चार सू छा गए जब जहां में हबीबे खुद...

टैबलेट या सरकारी खिलौने? तकनीकी शिक्षा का बड़ा धोखा

हरियाणा सरकार ने कोविड काल में 700 करोड़ रुपये खर्च कर 5 लाख छात्रों को टैबलेट बांटे थे, जिनका उद्देश्य डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देना था। परंतु तीन साल बाद इन टैबलेट्स में न तो सिम कार्ड हैं, न इंटरनेट की सुविधा, और न ही इनसे पढ़ाई हो रही है। इनमें 2025-26 तक का सिलेबस तो अपलोड है, लेकिन उपयोग शून्य। यह लेख सरकारी तंत्र की लापरवाही, नीति निर्माण की खामियों और बच्चों के भविष्य के साथ हुए छल पर सवाल उठाता है। तकनीक का दिखावा शिक्षा के अधिकार की हत्या बन चुका है। - डॉ. सत्यवान सौरभ कोविड-19 ने भारत समेत पूरी दुनिया को शिक्षा के डिजिटल स्वरूप की अहमियत से रूबरू कराया। जब स्कूल बंद थे, तब ऑनलाइन क्लास ही बच्चों की एकमात्र शैक्षणिक जीवन रेखा बनी। ऐसे में हरियाणा सरकार द्वारा 700 करोड़ की लागत से 5 लाख छात्रों को टैबलेट बाँटना एक प्रशंसनीय निर्णय प्रतीत हुआ। योजना थी कि छात्र आधुनिक तकनीक से जुड़ेंगे, डिजिटल ज्ञान की दुनिया में कदम रखेंगे और सरकारी शिक्षा का स्तर ऊँचा उठेगा। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, यह योजना एक झूठे वादे, दिखावटी प्रयास और भारी भरकम बजट की बर्बादी में बदलती गई।  एक रिपोर...

*माला, मीटिंग और मौन हसला: हरियाणा की शिक्षक ट्रांसफर ड्राइव का कटु सच*

(MIS डेटा, ट्रांसफर नीति और कैबिनेट बैठकों की चर्चाएँ केवल लटकाने की औपचारिकता)  शिक्षकों के बीच यह धारणा गहराती जा रही है कि MIS डेटा, ट्रांसफर नीति और कैबिनेट बैठकों की चर्चाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं। कई बार इन्हें निर्णयों को टालने या प्रक्रिया में पारदर्शिता के भ्रम को बनाए रखने के साधन के रूप में देखा जाता है। शिक्षक स्थानांतरण प्रक्रिया अब पारदर्शिता और निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है। MIS पोर्टल, नीति और मीटिंग अब बहाने लगने लगे हैं। संगठन मौन हैं और शिक्षकों में असंतोष गहराता जा रहा है। शिक्षा विभाग को चाहिए कि वह नीति को स्पष्ट, तिथि को निश्चित और प्रक्रिया को जवाबदेह बनाए। वरना यह असंतोष आंदोलन में बदल सकता है। शिक्षक सम्मान के साथ कार्य करें, यह तभी संभव है जब उन्हें उनके अधिकार बिना अपील के प्राप्त हों। ✍🏻 डॉ. सत्यवान सौरभ (कवि, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार) हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर ड्राइव अब एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर, एक गंभीर शैक्षिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। हर साल शिक्षक समुदाय इस प्रक्रिया से जुड़ी पारदर्शिता, समयबद्धता और न्य...

रक्षाबंधन: क्या वास्तव में निभा रहे हैं भाई-बहन प्रेम और रक्षा का वादा?

रक्षाबंधन केवल राखी बांधने और गिफ्ट देने का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और परस्पर सहयोग का प्रतीक है। आज यह पर्व सोशल मीडिया दिखावे और औपचारिकताओं में सिमटता जा रहा है। भाई-बहन सालभर दूर रहते हैं, पर एक दिन फोटो खिंचाकर ‘रिश्ता निभाने’ का प्रमाण दे देते हैं। असली रक्षा तब है जब मुश्किल वक्त में दोनों एक-दूसरे का सहारा बनें, चाहे वह भावनात्मक हो या आर्थिक। त्योहार का अर्थ लाइक्स नहीं, बल्कि लाइफ में प्रेज़ेंस है। राखी का धागा केवल कलाई पर नहीं, दिल में भी बांधना जरूरी है। -डॉ. सत्यवान सौरभ त्योहार भारत की सांस्कृतिक आत्मा का आईना हैं। वे केवल कैलेंडर में दर्ज तारीखें नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी भावनाओं, रिश्तों और सामाजिक बंधनों का जीवंत प्रतीक होते हैं। रक्षाबंधन भी ऐसा ही एक पर्व है, जो भाई-बहन के रिश्ते को स्नेह, सुरक्षा और विश्वास की डोर में बांधने का प्रतीक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम आज वास्तव में इस पर्व के मूल भाव को निभा रहे हैं, या यह भी अन्य त्योहारों की तरह दिखावे और औपचारिकता के चकाचौंध में खो गया है? परंपरा से वर्तमान तक...

("ट्रांसफर का इंतज़ार: 9 साल, 9 बहाने") *हरियाणा में टीचर ट्रांसफर: सरकारी सिस्टम का अमर रोग* "हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर: वादा, बहाना और थकान"

"जब एक शिक्षक रोज़ 150 किलोमीटर सफर करता है, तो वह सिर्फ सड़क नहीं नापता—वह अपनी उम्र, अपने रिश्ते और अपने सपनों को भी नापता है।" हरियाणा की ट्रांसफर व्यवस्था वैसी ही है जैसे किसी घर में पुराना अलार्म घड़ी—जो साल में एक-दो बार सही बज जाती है, बाकी समय बस टिक-टिक करती रहती है। फर्क बस इतना है कि यहां गलती से भी अलार्म बज जाए, तो सरकार चौंककर कहती है—"अरे! यह तो अपने आप हो गया, अगली बार ध्यान रखेंगे कि जल्दी न हो।" -डॉ. सत्यवान सौरभ हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर एक ऐसी बीमारी बन चुका है, जिसका कोई इलाज सरकार के पास नहीं, और शायद खोजने की कोशिश भी नहीं। यह बीमारी केवल प्रशासनिक फाइलों में नहीं, बल्कि हजारों शिक्षकों के दिलों, दिमाग और घरों में पसरी हुई है। बीते नौ साल से इसका लक्षण एक ही है—वादा, तारीख, बहाना, फिर नई तारीख, और फिर एक और बहाना। सरकारें आती-जाती रहीं, चेहरों पर बदलाव होता रहा, पर इस बीमारी की आदत नहीं बदली। सरकार के लिए यह सिर्फ एक प्रक्रिया है—कंप्यूटर के एमआईएस पोर्टल पर एक क्लिक, किसी फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल पर रखना। लेकिन एक शिक्षक के लिए ट्रांसफ...

जर्जर स्कूल, खतरे में भविष्यटूटी छतों और दीवारों के बीच कैसे पलेगी शिक्षा की नींव?

भारत में लाखों सरकारी विद्यालय जर्जर हालत में हैं। टूटी छतें, दरारों वाली दीवारें, पानी व शौचालय का अभाव—ये बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई दोनों पर खतरा हैं। पिछले नौ वर्षों में 89 हज़ार सरकारी स्कूल बंद हुए, जिससे शिक्षा में अमीर-गरीब की खाई और गहरी हुई। शिक्षा का अधिकार कानून सुरक्षित भवन की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है। सरकार, समाज और नागरिकों को मिलकर विद्यालय भवनों की मरम्मत और सुविधाओं में निवेश करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ मलबों पर नहीं, मजबूत नींव पर अपने सपने खड़ी कर सकें। -डॉ. सत्यवान सौरभ शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और विद्यालय उसके मंदिर। यह वह स्थान है जहाँ बच्चों के सपनों को आकार मिलता है, विचारों को पंख मिलते हैं और भविष्य की नींव रखी जाती है। परंतु दुख की बात है कि भारत में, विशेषकर ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में, इन मंदिरों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। अनेक विद्यालयों में छतें टूटी हुई हैं, दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें हैं, बरसात में पानी टपकता है, खिड़कियाँ टूटी हुई हैं, बेंच जर्जर हो चुकी हैं और पीने के पानी तथा शौचालय...

स्वतंत्रता का अधूरा आलाप"आज़ादी केवल तिथि नहीं, एक निरंतर संघर्ष है। यह सिर्फ़ झंडा फहराने का अधिकार नहीं,बल्कि हर नागरिक को समान अवसर और सम्मान देने की जिम्मेदारी है।जब तक यह जिम्मेदारी पूरी नहीं होती, हमारी स्वतंत्रता अधूरी है।"

— डॉ. प्रियंका सौरभ 15 अगस्त 1947 को हमने विदेशी शासन की बेड़ियों को तोड़ दिया था। तिरंगे की फहराती लहरों में वह रोमांच था, जो सदियों की गुलामी और अत्याचार के बाद जन्मा था। हर चेहरे पर एक ही उम्मीद थी—अब अपना देश अपनी मर्ज़ी से चलेगा, अब हर नागरिक को बराबरी का हक़ मिलेगा, अब हम अपने भविष्य के निर्माता होंगे। लेकिन आज़ादी के 78 साल बाद यह सवाल कचोटता है—क्या वह सपना पूरा हुआ? आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, विज्ञान और तकनीक में नए मुकाम हासिल हो रहे हैं। मेट्रो ट्रेन, डिजिटल पेमेंट, सैटेलाइट मिशन और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव हमें गर्व से भर देता है। लेकिन इस चमक के पीछे एक सच छुपा है—हमारी आज़ादी अब भी अधूरी है। यह अधूरापन केवल गरीबी या बेरोज़गारी का नहीं, बल्कि सोच, व्यवस्था और व्यवहार में गहरे बैठी असमानताओं का है। हमारे यहां लोकतंत्र का मतलब अक्सर सिर्फ़ चुनाव रह गया है। हर पाँच साल में वोट डालने को ही हम अपनी भागीदारी मान लेते हैं, लेकिन उसके बाद नेता और जनता के बीच एक अदृश्य दूरी बन जाती है। जनता शिकायत करती है, सरकार सफ़ाई देती ...

"आवारा कुत्तों पर लगाम: मानव जीवन पहले""सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश—करुणा के साथ सुरक्षा भी जरूरी"

"मानव जीवन और सुरक्षा पहले — सुप्रीम कोर्ट" सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि हर इलाके से आवारा कुत्तों को हटाकर सुरक्षित स्थानों पर रखा जाए। प्रक्रिया में बाधा डालने वाले संगठनों या व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई होगी। यह आदेश बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। कुत्तों के हमलों और रेबीज़ जैसी घातक बीमारी के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। कोर्ट ने संतुलित समाधान सुझाया—कुत्तों को मारा नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें सुरक्षित आश्रयों में रखा जाएगा। यह मानव और पशु, दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ठोस कदम है। --- डॉ. सत्यवान सौरभ सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय, जिसमें हर इलाके से आवारा कुत्तों को हटाकर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने का निर्देश दिया गया है, एक अहम और लंबे समय से प्रतीक्षित कदम है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा—"मानव जीवन और सुरक्षा पहले"—जो इस मुद्दे पर चल रही बहस में एक निर्णायक रुख को दर्शाता है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि अब समय आ ग...

भारत@79: अटूट शक्ति की ओर"79 वर्षों की यात्रा से विश्व-नेतृत्व की दहलीज़ तक — भारत का समय अब है।"

"उन्नासी वर्ष की यात्रा में भारत ने संघर्ष से सफलता, और सफलता से नेतृत्व की राह तय की है। आज हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र, उभरती अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में खड़े हैं। परंतु असली लक्ष्य अभी बाकी है — शिक्षा में नवाचार, आत्मनिर्भर कृषि-उद्योग, स्वदेशी रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और सामाजिक एकता के पाँच स्तंभ हमें विश्व नेतृत्व की ओर ले जाएंगे। यह समय उत्सव का भी है और संकल्प का भी, ताकि भारत न केवल अपने लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए विकास और शांति का मार्गदर्शक बने।" — डॉ. सत्यवान सौरभ उन्नासी वर्ष पहले, आधी रात के सन्नाटे में जब भारत ने स्वतंत्रता का पहला श्वास लिया, तो वह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी। वह एक संपूर्ण सभ्यता के पुनर्जन्म का क्षण था। तिरंगा जब लाल किले की प्राचीर पर लहराया, तो हर गाँव, हर शहर, हर हृदय में आत्मसम्मान का एक दीप जल उठा। यह दीप केवल एक दिन के लिए नहीं था; इसे जलाए रखना हमारी पीढ़ियों की जिम्मेदारी बन गई। आज हम उस गौरवशाली यात्रा के उन्नासी वर्ष पूरे कर चुके हैं। इस दौरान हमने अनगिनत उपलब्धियाँ हासिल कीं — वैज्ञानिक प्रगति...