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परंपराओं से कटाव और समाज का विघटनवामपंथी सोच और भारतीय संस्कृति: समृद्धि या विकृति?- डॉ सत्यवान सौरभभारत, एक ऐसा देश जहां संस्कृति, धर्म, कला, और साहित्य की जड़ें सदियों से फैली हुई हैं, आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह देश विविधताओं में एकता का प्रतीक है, और इसकी सांस्कृतिक धरोहर विश्वभर में प्रशंसा पाती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज के कई पहलुओं पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। इस विचारधारा ने साहित्य, कला, शैक्षिक संस्थानों, और इतिहास के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति को चुनौती दी है। वामपंथी विचारधारा का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है, इसे समझने के लिए हमें इसके विभिन्न पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करना होगा।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय साहित्य और कला में आधुनिकता के नाम पर ऐसे बदलाव लाने की कोशिश की है, जो भारतीय समाज के पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ हैं। साहित्य और कला समाज की संवेदनाओं और मानसिकताओं को प्रकट करने का माध्यम होते हैं। साहित्यकारों और कलाकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे समाज को सही दिशा में मार्गदर्शन करें, न कि उसे भ्रमित करें। वामपंथी विचारकों ने साहित्य में अश्लीलता, विकृत मानसिकताओं और व्यक्तिगत संबंधों की विकृति को ‘आधुनिकता’ के नाम पर प्रस्तुत किया है। यह केवल समाज में नैतिकता की गिरावट का कारण नहीं बनता, बल्कि यह समाज में असंतुलन और असहमति की स्थिति भी उत्पन्न करता है।वामपंथी लेखकों ने भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपराओं को नकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उन्होंने देवी-देवताओं, धार्मिक परंपराओं और संस्कारों का मजाक उड़ाया, और इसे साहित्य में "आधुनिकता" के रूप में प्रस्तुत किया। जब साहित्यकार समाज की जड़ों से कटकर केवल पश्चिमी विचारधारा को अपनाते हैं, तो वे समाज के पारंपरिक मूल्यों और नैतिकताओं से दूर हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय साहित्य और कला में एक खोखली और विकृतता फैलने लगती है।वामपंथी विचारधारा ने कला के माध्यम से भी भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को चुनौती दी है। कलाकारों ने परंपरागत रूपों को छोड़कर आधुनिक कला को अपनाया, जो भारतीय संस्कृति और उसकी गहरी जड़ों से कटकर बाहरी प्रभावों को स्वीकार करता है। यही कारण है कि भारतीय कला में पारंपरिक रूपों की जगह पश्चिमी और वैश्विक विचारधारा का दबदबा बढ़ा है, जो भारतीय समाज के साथ न सुसंगत हैं।भारतीय शैक्षिक संस्थान, जहां युवा पीढ़ी अपनी शिक्षा प्राप्त करती है, वहां वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव है। कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वामपंथी विचारकों ने अपनी विचारधारा को छात्रों पर थोपने का प्रयास किया है। यह विचारधारा भारतीय समाज की वास्तविकता और संस्कृति से दूर होती है और कभी-कभी इसे विकृत रूप में प्रस्तुत करती है। छात्रों को यह सिखाने के बजाय कि भारतीय संस्कृति, धर्म, और परंपराओं की अपनी गहरी अहमियत है, इन संस्थानों में अक्सर उन्हें आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पेश किया जाता है। वामपंथी विचारधारा का यह प्रयास छात्रों में भ्रम और असंतुलन उत्पन्न करता है।वामपंथी विचारक भारतीय इतिहास को भी एक निश्चित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, जिसमें केवल नकारात्मक पक्षों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। जातिवाद, असमानताएँ, और सामंती व्यवस्था जैसी समस्याओं को तो बड़े पर्दे पर लाया जाता है, लेकिन भारतीय समाज में सहिष्णुता, प्रेम, और विविधता के पक्षों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब विद्यार्थियों को एकतरफा दृष्टिकोण से शिक्षा दी जाती है, तो वे भारतीय समाज की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक धरोहर को सही तरीके से नहीं समझ पाते। इसके परिणामस्वरूप, एक नई पीढ़ी को ऐसी शिक्षा मिलती है, जो समाज के बारे में एक पक्षीय और विकृत दृष्टिकोण अपनाती है।वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में, छात्र संगठनों ने भी भारतीय समाज और संस्कृति की आलोचना करना शुरू कर दिया है। विश्वविद्यालयों में आयोजित बहसों और विचार-विमर्शों में अक्सर यह देखा जाता है कि वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किसी भी कीमत पर भारतीय परंपराओं और धर्मों का मजाक उड़ाया जाता है। यह भारतीय समाज के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति की नींव को कमजोर करता है और समाज के भीतर असहमति उत्पन्न करता है।भारतीय इतिहास में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के अंधेरे पहलुओं को उजागर किया है, जैसे जातिवाद, सामंती व्यवस्था, और ब्रिटिश शासन की आलोचना। हालांकि, इन पहलुओं को नकारना नहीं चाहिए, लेकिन वामपंथी दृष्टिकोण भारतीय इतिहास को एकतरफा और विकृत रूप में प्रस्तुत करता है।वामपंथी इतिहासकार भारतीय धर्म, संस्कृति, और परंपराओं को आलोचना करते हैं और उन्हें तुच्छ रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने भारतीय समाज के असमानताओं और संघर्षों को ही प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया है और कभी भी भारतीय सभ्यता के सकारात्मक पहलुओं को महत्व नहीं दिया। भारतीय समाज में जिस प्रकार का सामूहिक प्रेम, सहिष्णुता, और अहिंसा का संदेश है, उसे वामपंथी इतिहासकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। इस दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास को एकतरफा रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति और समाज के वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर है।यह विडंबना है कि कुछ राष्ट्रवादी विचारक और नेता, जो पहले वामपंथी विचारधारा के आलोचक थे, अब उन्हें मंचों पर बुलाते हैं और उनके विचारों को अपनाने की कोशिश करते हैं। यह स्थिति भारतीय राजनीति के लिए खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इससे राष्ट्रवाद की असली भावना कमजोर हो जाती है। राष्ट्रवाद का उद्देश्य केवल भारतीय संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करना होना चाहिए, लेकिन जब ऐसे विचारक, जो पहले भारतीय धर्म और संस्कृति का मजाक उड़ाते थे, अब राष्ट्रवाद का चेहरा बनने की कोशिश करते हैं, तो यह स्थिति समाज में भ्रम उत्पन्न करती है।राष्ट्रवाद का वास्तविक उद्देश्य भारतीय समाज के सामूहिक हितों की रक्षा करना है, और इसके लिए हमें अपनी संस्कृति, धर्म, और परंपराओं की रक्षा करनी होगी। वामपंथी विचारक अब राष्ट्रवाद का हिस्सा बनकर अपने पुराने विचारों से पलायन कर रहे हैं, जिससे भारतीय समाज में एक नया भ्रम पैदा हो रहा है। जब राष्ट्रवादी विचारक वामपंथी विचारधारा को स्वीकारने की कोशिश करते हैं, तो यह राष्ट्रवाद की सच्चाई को कमजोर करता है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों को कमजोर किया है। भारतीय समाज में परिवार और रिश्ते केवल सामाजिक संस्थाएँ नहीं होते, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन वामपंथी विचारधारा ने इसे केवल एक सामाजिक संस्था के रूप में प्रस्तुत किया है, जो व्यक्तिगत स्वार्थ और अधिकारों पर आधारित है। यह दृष्टिकोण समाज में असंतुलन पैदा करता है और पारंपरिक परिवार व्यवस्था को कमजोर करता है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज में उन मूल्यों को भी नष्ट करने का प्रयास किया है, जो समाज के सामूहिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। जैसे कि भारतीय समाज में गुरू-शिष्य परंपरा, परिवार के प्रति समर्पण, और समाज के प्रति दायित्व की भावना अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। लेकिन वामपंथी विचारधारा ने इसे केवल एक "पारंपरिक" और "अहंकारी" दृष्टिकोण के रूप में पेश किया है, जिससे समाज में असंतुलन और असहमति की स्थिति उत्पन्न हो रही है।वामपंथी विचारधारा ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से कई विकृतियाँ फैलाई हैं। इस विचारधारा ने साहित्य, कला, शिक्षा और इतिहास के माध्यम से भारतीय संस्कृति और समाज के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय समाज की शक्ति और एकता केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक विश्वासों में ही निहित है। वामपंथी विचारधारा का विरोध करना हमारा कर्तव्य है, ताकि हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा कर सकें।अब समय आ गया है कि हम वामपंथी विचारों को पहचानें और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय कदम उठाएँ। यही हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी रहें और हमारे समाज की एकता और शक्ति बनी रहे।- डॉo सत्यवान सौरभ,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381-- Dr. Satyawan Saurabh,Poet, freelance journalist and columnist,All India Radio and TV panelist,333, Pari Vatika, Kaushalya Bhavan, Barwa (Siwani) Bhiwani,Haryana – 127045, Mobile :9466526148,01255281381-- ਡਾ. ਸਤਿਆਵਾਨ ਸੌਰਭ,ਕਵੀ, ਸੁਤੰਤਰ ਪੱਤਰਕਾਰ ਅਤੇ ਕਾਲਮਨਵੀਸ,ਆਲ ਇੰਡੀਆ ਰੇਡੀਓ ਅਤੇ ਟੀਵੀ ਪੈਨਲਿਸਟ,333, ਪਰੀ ਵਾਟਿਕਾ, ਕੌਸ਼ਲਿਆ ਭਵਨ, ਬਰਵਾ (ਸਿਵਾਨੀ) ਭਿਵਾਨੀ, ਹਰਿਆਣਾ - 127045, ਮੋਬਾਈਲ : 9466526148,01255281381नोट- आपको प्रकाशनार्थ भेजी गई मेरी रचना/आलेख/ कविता/कहानी/लेख नितांत मौलिक और अप्रकाशित है।

(सच्चे पुरस्कार का मूल्य) शिक्षक सम्मान: सच्चे समर्पण की पहचान और पारदर्शिता की आवश्यकता

सच्चे पुरस्कार का मूल्य उस कार्य में निहित है, जो किसी व्यक्ति ने समाज और समुदाय के लिए किया है। पुरस्कार का असली उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत पहचान या नौकरी बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, यह उन लोगों को सम्मानित करना चाहिए, जो समाज में सार्थक बदलाव लाने में सफल रहे हैं, चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो या किसी अन्य क्षेत्र में। ऐसे पुरस्कार समाज के वास्तविक विकास और भले के लिए होना चाहिए, न कि केवल एक व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक। - डॉ. प्रियंका सौरभ शिक्षक सम्मान, जो हमेशा से समाज में एक उच्च स्थान प्राप्त है, आजकल कुछ बदलावों का सामना कर रहा है। शिक्षा के प्रति कुछ शिक्षकों का जूनून और उनका समर्पण वाकई शिक्षा की नींव को मजबूत करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया ट्रेंड देखने को मिला है—"गैर सरकारी संगठन" द्वारा शिक्षकों को सम्मानित करने की प्रक्रिया। जहां एक ओर यह कदम सराहनीय है, वहीं दूसरी ओर इसमें पक्षपात और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का भी असर देखा जा रहा है। विद्यालयों या महाविद्यालयों के प्रिंसिपल द्वारा नाम लेने के दौरान अक्सर यह देखा गया है कि कु...

दुर्गेश की हत्या जातीय विद्वेष का नतीजा, दोषियों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएदलित युवक दुर्गेश कुमार की हत्या के बाद किसान नेताओं ने मृतक के परिजनों से मुलाक़ात की

आजमगढ़ 10 सितम्बर 2025. दलित युवक दुर्गेश कुमार की हत्या के बाद सोशलिस्ट किसान सभा और किसान एकता समिति के प्रतिनिधि मंडल ने मृतक के परिजनों से नौशेरा, जीयनपुर में मुलाक़ात की. प्रतिनिधि मंडल में किसान नेता राजीव यादव, महेन्द्र यादव, साहबदीन, नन्दलाल यादव शामिल थे.  प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि दुर्गेश कुमार की हत्या जातीय विद्वेष का नतीजा है. दोषियों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की जाए, जिससे सामंती ताकतों की इतनी हिम्मत न हो कि किसी दलित युवक को पीट-पीटकर मार डालें. मृतक के पिता इंदल राम ने बताया कि 25 तारीख़ को गणेश यादव सात-आठ लोगों के साथ आकर धमकी दिए थे. लड़की से बात करने का मामला था. इससे स्पष्ट है कि हत्या पूर्वनियोजित थी.  दुर्गेश के पिता बार-बार कहते हुए अचेत हो जा रहे थे कि वह साढ़े पांच फुट का था. उन्होंने बताया कि घर से उसे बुलाकर पीट-पीटकर मारा और जब उनका बेटा दर्द से कराह रहा था तो दर्द कम करने के नाम पर दवा कहकर जबरदस्ती जहर पिला दिया. दुर्गेश ने फोन पर और जब उसको अस्पताल ले जा रहे थे तो कितनी बेरहमी से उसे पीटा गया बताते हुए बार-बार कह रहा था कि उसकी जान ब...

राज्यमंत्री/प्रभारी मंत्री बलदेव सिंह औलख ने बाढ़ पीड़ितों को वितरित की राशन किट।

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत राज्यमंत्री/जनपद के प्रभारी मंत्री कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग उ0प्र0 बलदेव सिंह औलख के साथ जिलाध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह व जिलाधिकारी ज्ञानेन्द्र सिंह ने तहसील अमरिया क्षेत्रान्तर्गत जोशी कालोनी व टांडा विजैसी में पहुंचकर बाढ़ पीड़ितों को खाद्यान्न किट व तिरपाल वितरित की। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित लोगों से बातचीत की उनका हाल जाना व उनकी समस्याओं को सुना।  मा0 मंत्री जी ने खाद्यान्न किट में उपलब्ध सामान की जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में हमसब का कर्तव्य है कि बाढ़ पीडितों की मदद करने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही राजस्व टीम द्वारा किसानों की फसलों की हुई क्षति का आंकलन किया जायेगा और किसानों को मुआवजा दिया जायेगा।   जिलाधिकारी ने कहा कि बाढ़ से प्रभावित लोगों के घर तक राशन किट पहुंचायी जा रही है। उन्होंने कहा कि बाढ़ से प्रभावित ग्रामों में एडीएम/एसडीएम सहित विभिन्न टीमें मौके पर पहुंचकर बाढ़ पीड़ितों की लगातार मदद कर रही है।  उन्होंने कहा कि बाढ़ से प्रभावित ग्रामों में एंटी लार्वा...

भारतीय रणनीति और पड़ोसी देशों की उथल-पुथलदक्षिण एशिया की अस्थिरता और भारत की चुनौतियाँ

दक्षिण एशिया इस समय राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव में हालिया घटनाओं ने भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर सीधा प्रभाव डाला है। चीन और अमेरिका अपनी-अपनी टूलकिट के जरिए क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं। भारत के लिए केवल प्रतिक्रियात्मक नीति पर्याप्त नहीं है; उसे कूटनीतिक सक्रियता, आर्थिक निवेश, सुरक्षा सहयोग और सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत करना होगा। साथ ही आंतरिक एकजुटता को बनाए रखना अनिवार्य है। भारत अब मूकदर्शक नहीं रह सकता; उसे निर्णायक भूमिका निभाकर क्षेत्रीय स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को सुरक्षित करना होगा। ✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ दक्षिण एशिया आज जिस अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, वह केवल स्थानीय राजनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्तियों के गहरे हस्तक्षेप का दुष्परिणाम भी है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों में हाल के वर्षों में जिस तरह राजनीतिक हलचलें और जनआंदोलन सामने आए हैं, उन्होंने पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। नेपाल में युवाओं की भीड़ का संसद पर धावा, बांग्लादेश में सरकार के खिल...

पंचायत का ऐतिहासिक फैसला : लोगों पर अत्याचार करने वाले दो भाईयों को किया कुरैशी बिरादरी से‌ निष्कासित।

Report By:Anita Devi  देवरनियां के मुंडिया जागीर में कुरैशी बिरादरी की बैठक में हुआ फैसला। जानलेवा हमले में बिरादरी से निष्कासित दोनों भाईयों समेत चार पर हुए हैं नामजद। पुलिस की रैड, आरोपी फरार। देवरनियां। लोगों पर जुल्म- अत्याचार करने वालों पर कानून का शिकंजा कसने के अलावा बिरादरी का शिकंजा कसने लगा है। नगर पंचायत देवरनियां के कस्बा मुंडिया जागीर में कुरैशी बिरादरी के लोगों पर जुल्म करने वाले दो सगे भाईयों को पूरे परिवार के साथ बिरादरी से निष्कासित करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है। कस्बा मुंडिया जागीर निवासी अशरफ कुरैशी, रहीसा कुरैशी दोनों सगे भाईयों के अलावा रहीसा कुरैशी के पुत्र इस्लाम कुरैशी  और  अलीम कुरैशी पर मुंडिया जागीर निवासी मोहम्मद आसिफ ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि  उक्त लोगों ने उस पर जानलेवा हमला किया है, जिससे वह बाल-बाल बच गया। इस रिपोर्ट के बाद सी.ओ बहेड़ी व  देवरनियां कोतवाली पुलिस ने आरोपियों के घर रैड मारी थी, मगर वह हत्थे नहीं चढे।  ... कुरैशी बिरादरी का ऐतिहासिक फैसला। सोमवार रात कुरैशी बिरादरी की बैठक मुंडिया...

सपा युवा इकाई युवजन सभा में संगठन विस्तार में ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने मोहम्मद फैज़ अंसारी को पुनः ज़िला उपाध्यक्ष नियुक्त किया*

शाहिद खान संवाददाता पीलीभीत*  पीलीभीत। समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में संगठन विस्तार की प्रक्रिया के तहत ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने  मोहम्मद फैज़ अंसारी 'शानू' को पुनः ज़िला उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति की घोषणा के साथ ही कार्यकर्ताओं में हर्ष का माहौल है। मोहम्मद फैज़ अंसारी लंबे समय से समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं और पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संगठन के विभिन्न कार्यक्रमों, आंदोलनों और सामाजिक सरोकारों में उनकी सक्रिय उपस्थिति ने युवाओं के बीच उन्हें एक लोकप्रिय चेहरा बना दिया है। इस अवसर पर ज़िला अध्यक्ष हरगोविंद गंगवार ने कहा कि फैज़ अंसारी शानू ने हमेशा पार्टी के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखते हुए कार्य किया है। युवाओं को जोड़ने और समाजवादी विचारधारा को मज़बूती देने में उनकी भूमिका सराहनीय है। हमें पूरा विश्वास है कि आगे भी वे इसी तरह संगठन को मज़बूत करेंगे। नियुक्ति पर मोहम्मद फैज़ अंसारी ने ज़िला अध्यक्ष सहित संपूर्ण नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मैं संगठन को और अधिक...