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"मिले सुर मेरा तुम्हारा"


"मिले सुर मेरा तुम्हारा"

                                     मै भी सुर से सुर मिलाना चाहता हूं, लेकिन करूं क्या! दिल है कि मानता नहीं! मैं 
प्रगतिशील और अवसरवादी मित्रों को सफाई देता हूं, - " जाने दीजिए, दिल तो बच्चा है जी !" ( मित्र मन ही मन बद्दुआ देकर कोरोना का वर्तमान स्कोर देखने के लिए टीवी खोल लेते हैं !) मै दिल से पूछता हूं, - दिले नादां तुझे हुआ क्या है ! दो तीन बार पूछने पर अंदर से फुफकारती हुई आवाज़ आई ,- ' अबे ओ मंच से ठुकराए हुए कवि ! हालात- ए - से सुलह कर , वरना किचन तेरा विधवा हो जाएगा ! सुर से सुर मिलाना सीख बेसुरे! वरना वक्त तुझे डस्टबिन में डाल देगा '!
           जानता तो मै भी हूं कि  सुर से सुर का मिलना कितना ज़रूरी है ! अब देखिए ना, सुर से सुर मिल जाए तो सरकार बन जाती है! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी " मुख्य मंत्री"  से सीधे  " कमलनाथ" होकर रह जाता है! सुर की महिमा अपरम्पार! अब देखिए ना, अगर असुर भी प्रशासन से सुर मिला लेे तो थाने के अंदर विधायक को गोली मार कर ज़मानत पा सकता है,लेकिन सरगम बिगड़ जाए तो अच्छी भली धीमी गति के समाचार की रफ़्तार से चलती स्वस्थ गाड़ी भी उलट कर प्राणी को " विकास दूबे" बना देती है !
         कांग्रेसी नेताओं को सुर की इम्पोर्टेंस का पता था, तभी वो इतनी देर तक रेगिस्तान में नाव चलाते रहे। वो जानते थे कि ये विभिन्न सुरों वाले महापुरुषों का देश है, इसलिए सबके सुरों का ध्यान रखते थे! ( दंगे और विकास दोनों में गज़ब का तालमेल था!)  उनके नेताओं का कांफिडेंस इतना गज़ब था कि जनता को असंभव स्लोगन सुनकर भी हैरानी नहीं होती थी । कांग्रेस शासनकाल में एक नारा आया, - चार कदम सूरज की ओर ! जनता ने बिलकुल नहीं पूछा ,- कैसे! ( जब कि उस वक्त उनकी पार्टी में कुछ नेता इतने वयोवृद्ध थे कि ठीक से चला नहीं जाता था !)
    सुर का सुर से मिलना कितना ज़रूरी होता है, इसका अनुभव ' आसाराम ' और राम रहीम ' से ज़्यादा किसे होगा ! जब तक सरगम से मधुर मोहिनी का जादू चला नेता चरणों में लोट पोट करते रहे,कुंडली  " सद्कर्मों ' से लबालब होते ही नेता सरगम से निकल भागे, ' हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है!' 
       सुर से सुर मिल जाए तो अस्थिर सरकार भी ५ साल चल जाती है ! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी "जीतन राम मांझी " होकर रह जाता है। सुर का सुर से मिले रहना कितना ज़रूरी होता है, इसे कोई अशोक गहलोत से पूछे; जो आजकल विधायकों का पूरा पिंजरा उठाए इस होटल से उस होटल भागते हुए नजर आ रहे हैं! ( फिर भी पक्का पता नहीं कि सुर असुर के बीच चल रहे इस समुद्र मंथन से " अमृत" बरामद होगा या  कड़वा "हलाहल" !)
               सुर मिलाने में सावधानी जरूरी है, वरना जीवन भर इंसान को ये सदमा सदमा सोने नहीं देता , - दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनियां बनाई!' मैरिज के मामले में भी सुर से सुर के मिलाप से पहले दिल को दड़बे में डाल कर दिमाग़ का इस्तेमाल करना चाहिए , वरना जीवन भर  'के एल सहगल'  के स्वर में गाना पड़ सकता है, जब दिल ही टूट गया- तो जी के क्या करेंगे "! ( अबे, किसी और से सुर मिला ना !)
     सुर मिलाने के  शूरवीरों का क्या कहना! अगर इस कला में महर्षि हो गए तो,,,,, बकवास को ही विकास समझाया जा सकता है।बेकारी को रोज़गार और खाली जेब को आत्मनिर्भर  समझने वाली नस्ल टीवी देख कर दीक्षित हो रही है । कोरोना  और विकास के इस ऑड - ईवन  में कोरोना आगे चल रहा है ! दिल जलता है तो जलने दो !  सितारों से आगे जहां और भी हैं,,,,,, पहले 'विश्व गुरू' होना ज़रूरी है!
           बेकारी बे काबू है और किचन क्रिटिकल! आपदा को  "अवसर" बनाने की खबरें चारों ओर से आ रही हैं ! ( लोग अपने अपने तरीके से आत्मनिर्भर हो रहे हैं !) अब जब कि कोरो ना संक्रमित मरीज की तादाद 50000( 24घंटे में) पार कर गई है तो कहीं राशन किट नहीं बट रही है। सारे कोरो ना योद्धा  सर्टिफिकेट चोंच में लिए शीतनिद्रा में जा चुके है।

   जागो मोहन प्यारे जागो !!

मेहमान - लेखक सुल्तान भारती

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