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भाग दौड़! "


भाग दौड़ !"

              मै कन्फ्यूज़ हूं , समझ नहीं पा रहा हूं कि भागूं या दौड़ू। संक्रमित बुद्धि वालों को भाग और दौड़ के बीच का अंतर समझ में नहीं आ आ रहा होगा ! सुनने में भागना और दौड़ना एक जैसा लगता है, लेकिन दोनों में ' मालगाड़ी ' और ' रेल गाड़ी' वाला फर्क होता है ! भागना अपनी मर्जी से होता है और दौड़ना सामने वाले की मर्जी से ! कुछ प्राणियों का कन्फ्यूजन इतना प्रगाढ़ होता है कि पूरी ज़िन्दगी ये समझने में खर्च देते हैं, पहले भागें या फिर दौड़ें ! इस कशमकश में ' - कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे , हो जाता है!
       वक्त बदल गया है ! पहले भाग दौड़ करने से घर चल जाता था ! अब भाग दौड़ करने से घर चलने की बजाय घर का गेहूं बिक जाता है। आदमी दिन भर भाग दौड़ कर जेब की आख़री अठन्नी खर्च कर लौट के बुद्धू घर को आ  जाते हैं! भाग दौड़ से भी कुछ आउट पुट निकलता नजर नहीं आता ! ज़िंदगी आश्वासन पर टिक कर रह गई है। विडंबना यह है कि आश्वासन से आटे का कनस्टर नहीं भरता।                                                            मै रोज दस लोगों को फ़ोन करता हूं । पता चलता है कि सभी भाग दौड़ कर रहे हैं। दोपहर तक रोटी रोज़ी के लिए और उसके बाद बिजली के तुगलकी बिल के लिए ! होता कुछ नहीं, काम को कोरोना निगल गया और बिजली के बढ़े हुए बिल के लिए आपका "वोट" ज़िम्मेदार है! तो,,,, कुल मिलाकर कोरो  और आपदा दोनों के लिए आप खुद ज़िम्मेदार हैं !
     मैं भी भाग दौड़ कर रहा हूं। इस शृंखला में दिल्ली की सारी सड़के नाप डाली हैं ! काम तो मिला नहीं, लेकिन अंदर से मिल्खा सिंह होने की फीलिंग आ रही है! कल की भाग दौड़ के लिए यही फीलिंग काफ़ी है। भाग दौड़ के मामले में अब मेरे आत्मनिर्भर  होने की शुरुआत हो चुकी है।
मेहमान - लेखक सुल्तान भारती

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