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गांव की बेटी


 उस दिन सायंकालीन का समय था, मौसम अपना मिजाज बदल रहा था। वर्षा ऋतु अभी समाप्त नहीं हो पाई थी कभी गर्मी होती तो कभी वर्षा की बौछारें वातावरण में ठंडक उत्पन्न कर देती थी। आज फिर दीन मोहम्मद और मेहरदीन के मध्य विवाद हुआ। कहासुनी के बाद बात बढ़ गई थी और मेहरदीन को ईट भी लगी थी दोनों के विवाद की तेज आवाजें सुनकर मोहल्ले व आस पड़ोस के काफी लोग आ गए थे। दोनों पक्षों को समझाने बुझाने का प्रयत्न  हो रहा था।  मोहल्ले के वजनदार व्यक्ति भी दोनों के विवाद की बात सुनकर भीड़ में पहुंचे थे । रामदीन मोहल्ले के एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी बात गांव के सभी जातियों के लोग मानते थे।  रामदीन प्रायःलोगों के दुख दर्द में काम आते थे । इतने बड़े जमीदार व धनाढय होते हुुए भी उनमें बनावट व दिखावा नाम की कोई चीज न थी। सादे वस्त्र धारण करना, निर्धन व धनी में कोई फर्क ना महसूस करना, गिले- शिकवे भुला कर अपने भाइयों के साथ मिलजुल कर बैठना। भगवान ने उन्हें ग्राम की उस मिट्टी से बनाया था जहां देश प्रेम, भाईचारा ,सांप्रदायिक सौहार्द व एकता देखते ही झलकती है। यही कारण था कि पिछले 15 वर्ष से लगातार ग्राम प्रधान बनते चले आ रहे थे। ग्राम का कोई भी व्यक्ति उनका प्रबल विरोधी ना था। ग्राम के छोटे-मोटे मुकदमों का निपटारा रामदीन की न्याय पंचायत में होता था। इस अदालत की एक और तारीफ थी कि यह दोनों पक्षों को संतुष्ट करने के बाद ही अपना निर्णय सुनाती थी । पुलिस तो ग्राम में नाममात्र को आती थी।  गत वर्ष का शांति- एकता पुरस्कार इसी ग्राम ने जीता था।  यह अवार्ड उस  ग्राम प्रधान को दिया जाता था।  जिसमें पूरे वर्ष कोई भी विवाद थाने में न गया हो।  और दोनों पक्षों को न्याय प्राप्त हो गया हो।  विवाद के पश्चात न्याय पंचायत की साप्ताहिक बैठक में अन्य मुकदमों के अलावा दीन मोहम्मद और मेहरदीन का मुकदमा भी सुना जाना था । एक के बाद एक करके सारे मामलों का निपटारा होता चला गया । बस अब एक ही मुकदमा  रह गया था जो इन दोनों का था 

मुकदमे की कार्यवाही शुरू की गई दोनों पक्षों को बारी-बारी से अपने-अपने पक्ष रखने थे। पहले मेहरदीन का ही नंबर आ गया  । उसने खड़े होकर पंचों को अपने खिलाफ ज्यादती का विवरण सुनाना प्रारंभ कर दिया है 

"आज की इस पंचायत में मेहरदीन ने बोलना प्रारम्भ किया। आज की इस पंचायत के जज साहब!  मेरा दीन मोहम्मद से कोई विवाद नहीं था मेरी नाली उसके घर के बराबर नहीं थी, न मेरी नाली इसके घर के बराबर से गुजरती है, न मेरा कोई जमीन की मेढ का विवाद है । मैं प्रतिदिन की भांति मजदूरी से लौटकर आ रहा था कि दीन मोहम्मद व उसके साथियों ने घेर लिया और पिटाई की तथा एक व्यक्ति ने मकान के ऊपर से मेरे ऊपर ईट भी फेंक कर मारी जिससे मेरी टांग घायल हो गई है। मै घायल अवस्था में मजदूरी पर नहीं जा सकता हूं मेरे परिवार के सामने रोजी-रोटी का सवाल उत्पन्न हो गया है । अतः आप लोगों से प्रार्थना करता हूं कि मेरी दुर्बलता वह निर्धनता को ध्यान में रखते हुए मेरी सुरक्षा की जाए । 

"जज साहब!  यह बात सरासर झूठी है, पंचायत में से एक व्यक्ति ने चीखते हुए बोला 

नहीं नहीं जज साहब  यह सत्य है, यह लोग मुझे गांव से भगाना चाहते हैं क्योंकि मैं गरीब हूं ना

" लेकिन मैं भी इन्हें  नाकों चने चबा दूंगा ।मैं तुम्हें देख लूंगा पहले वाला व्यक्ति बोला कि।

  "मैं भी डरने वाला नहीं हूं । 

"खामोश हो जाएं ! आप लोग जज महोदय ने लोगों से शांत होने की अपील की।

 परंतु भीड़ के शोर में जज महोदय की आवाज दब कर रह गई ।भीड़ में शोरगुल बढ़ता ही जा रहा था ।यदि अनुशासन का पालन कर आते तो बात बढ़ते देर न लगती और वहां विवाद का नया रूप उठ खड़ा होता अदालत की गरिमा भी भंग हो सकती थी जब भीड़ ने दीन मोहम्मद से सफाई देने को कहा 

"जज साहब यह बात बिल्कुल सत्य है कि हमारा मेहरदीन  से कोई विवाद नहीं था लेकिन विवाद का कारण मेहरदीन नहीं इसका साला सिराज है । हमने कई बार पहले भी मेहरदीन  को समझाया था कि वह सिराज को अपने पास ना रखें।  मगर ये  उसकी तरफदारी करता है जबकि उसका चरित्र ठीक नहीं है।  जज साहब गांव की बेटी सब की बेटी होती है कल रात इसका साला हमारे घर में कूद आया और इसने महक निशा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी।

"महक  निशा कौन है?  जज महोदय ने पूछा 

महक निशा दीन मोहम्मद की लड़की है 

और जज  साहब हम इतने गए गुजरे तथा कमजोर नहीं है कि अपनी बहू बेटियों की सुरक्षा ना कर सके । उसका  चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था

  "जज साहब ! मामला आपके हाथ मे है।  आज इसने हमारी लड़की को छेड़ा है कल किसी और को भी छेडेगा  लिहाजा मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि  सिराज जैसे मुलजिम को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए । 

मुलजिम को हाजिर किया जाए जज महोदय ने आदेश दिया 

और पांच लठैतो की मौजूदगी में मुलजिम सिराज को पंचायत के सामने पेश किया गया। साथ - साथ मेहरदीन को भी उसके साथ खड़ा किया गया । मेहरदीन पक्ष ने  पंचों के सामने यह बात रखी कि लड़की के बयान भी लिए जाएं। 

 पंचों ने यह बात मानते हुए आदेश दिया कि मुलजिम सिराज अपनी सफाई में अथवा कुछ सत्य अथवा असत्य है पंचों सहित अदालत को अवगत कराएं ।

अतः पहले मुलजिम के बयान हुए।

 जज साहब!  समस्त पंचों व उपस्थित सज्जनों मेरे ऊपर लगाए गए आरोप बेबुनियाद है । 

"जज साहब! यह झूठ बोल रहा है इसकी यह तीसरी घटना है । दो घटनाएं प्रकाश में नहीं आ सकी थी।  

"आप चुप हो जाए जो कहना है बाद में कहे जज साहब ने आदेश दिया।

 न्याय पंचायत के आदेश पर सिराज ने एक बार फिर बोलना शुरू किया।  

"जज साहब!    मुझे फंसाया जा रहा है । काम से लौट रहा था तो महक निशा पानी का घड़ा लेकर आ रही थी रास्ते में गली के कोने पर सलीम   खड़ा था जब वह कोने पर आयी तो सलीम उसके साथ छेड़छाड़ कर रहा था  मैं दुकान से सामान लेकर जब वापस आया तो उस समय भी सलीम व महक निशा आपस मे बाते कर रहे थे ।मुझे देखते ही महक निशा ने  दामन छुड़ा कर भागना चाहा , बस धड़ाम की आवाज के साथ घड़ा फूट गया । यह देखते ही सलीम अपने घर भाग गया और मैं वहीं खड़ा रह गया ।  इतने में आवाज सुनकर यासीन चाचा भी आ गए। मुझे क्या पता था और  चाचा यासीन को देखते ही............. 

यासीन चाचा वह देखते ही क्या हुआ जज साहब बोले। 

" साहब  महक निशा  सुबक - सुबक कर रोने लगी और गाज मेरे ऊपर गिरी। मैंने लाख समझाया लेकिन मेरी एक न सुनी और शाम को सलीम ने भी यासीन चाचा को मेरे खिलाफ भड़का दिया इतना सुनते ही जज महोदय ने आदेश दिया कि लड़की को भी पंचायत में लाया जाए। रामदीन का यह आदेश सुनते ही  अदालत में हंगामा हो गया ।न्याय पंचायत की स्थिति बिगड़ने लगी लोगों ने आरोप लगाने प्रारंभ कर दिए। 

"रामदीन तू बिक गया है । हम इतने गिरे हुए भी नहीं है जो हमारी लड़की पंचायत में आए और न जाने किस-किस तरह की आवाजें पंचायत में आने लगी । लठैतो  ने जैसे तैसे करके स्थिति को संभाला । देखो!  लोगों आज तुम्हें क्या हो गया है इस पंचायत में हमेशा लोगों को न्याय मिला है। आज तक कोई बात थाने नहीं गई । फिर क्यों बात बढाना चाहते हो । रामदीन लोगों को समझा रहा था । मगर समझने को दीन मोहम्मद पक्ष तैयार नहीं था क्योंकि मेहरदीन पक्ष आरोप लगा रहा था जब कभी हमारे साथ ऐसा   विवाद  हुआ है , जिसमें महिलाओं के बयानों की जरूरत पड़ी है तो हमारी महिलाओं ने पंचायत में बयान दिए है।

दीन मोहम्मद के यहां 60 बीघा जमीन थी जबकि मेहदीन मजदूर था । दोनों के तर्कों को सुनने के बाद लड़की के घर पर ही जा कर ही पंचों ने बयान लिए लड़की ने अपने बयान में यह बात स्वीकार की सिराज ने पहले भी दो बार छेडा था तथा रात्रि में भी उसी की जैसी लंबाई तथा ऐसे कद का युवक था जिसे उसने अंधेरा होने के कारण नहीं देखा था।

 पंचों ने यह बात रामदीन को आकर बताई ।पंचो का मशविरा और विचार विमर्श हुआ जिसमें यह बात तय हुई कि अपनी अपनी राय दे। दो पंचों ने अंधेरा होने और न पहचानने की स्थिति को देखते हुए सिराज को क्षमादान देने का सुझाव रखा । जबकि 3 पंचों ने उसे कडा से कड़ा दंड देने की बात रखी । अंत में यह बात तय हुई कि गांव की बेटी सब की बेटी होती है।  इसलिए सिराज के पहले आचरण को देखते हुए उसे 5 जूते तथा 100 दिन गांव छोड़ने की सजा दी जाती है। तथा मेहरदीन को माफ किया जाता है।  भरी  पंचायत में पांच जूते  क्या शर्मदार  व्यक्ति के लिए एक तमाचा भी काफी होता है ।और अपमानित होकर सजा पाने के बाद सिराज उसी समय गांव छोड़कर चला गया। 

 और इस बीच मेहरदीन सफाई दी थी कि उसका साला सिराज ऐसा नहीं है परंतु किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया । 

26 जनवरी  को ग्राम में  गणतंत्र दिवस कार्यक्रम स्कूल के प्रांगण में चल रहा था ,नाटक ,देशभक्ति गीत ,लोकगीत आदि कार्यक्रमों ने ग्रामीणों में   अच्छा समां बांध रखा था इसके पश्चात मिठाई वितरण प्रोग्राम हुआ तथा ग्राम प्रधान व न्याय पंचायत के जज महोदय रामदीन ने गांव की एकता ,शांति व गांव की बेटी के बारे में भी अपने विचार रखें कि गांव की बेटी सब की बेटी होती है और उदाहरण दिया कि सिराज ने यह दुष्ट हरकत की थी जिसकी सजा पाकर उसे ग्राम से जाना पड़ा । 

27 जनवरी की प्रातः सूर्य की किरणों की चमक में कुछ धुंधलाहट थी। तथा पेड़- पौधों की खामोशी व पशु-पक्षियों की उदासी बता रही थी कि आज गांव में  अजीबो -गरीब घटनाक्रम हुआ है कि तालाब किनारे एक नवजात शिशु मृत अवस्था में पड़ा मिला था

 सिराज तो गांव छोड़े हुए भी  10 माह बीत चुके थे। ऐसे में यह ग्राम के वातावरण को किसने प्रदूषित किया था।  सिराज के जाने के पश्चात सलीम का ग्राम प्रभाव भी अच्छा जम गया था। उसके खिलाफ किसी की बोलने की हिम्मत ना थी। रामदेव को भी किसी ने यह सूचना भिजवा दी थी वह भी उस शिशु को देखने  पहुंच गए। शिशु मृत अवस्था में था। सायंकाल को कुछ लोगों के अनुरोध पर पंचायत बुलाई गई। मगर सलीम ने अपना वर्चस्व दिखाते हैं उसमें मेहरदीन व उसके साथियों को नहीं जाने दिया । पंचायत की कार्रवाई शुरू की गई जो पंच सिराज को सजा दिलवाने वाले थे वही पंच चुने गए । कुछ लोगों ने यह मामला उठाना चाहा परंतु पंचों ने अपने प्रभाव से दबा दिया । मेहरदीन चीख-चीख कर पर आरोप लगा रहा था मगर भीड़ में उसकी आवाज दब कर रह जाती थी।  सारा गांव जानता था कि गांव की बेटी गांव की बेटी होती है इसलिए सभी चुप थे । जबकि सबको पता था कि यह पाप किसका हो सकता है, आख़िर बात तो एक गांव की बेटी की थी।   

प्रस्तुति एस ए बेताब

 यह कहानी लेखक ने जनवरी 1995 में लिखी थी और उस वक्त की हिंदी समाचार पत्रिका "आज की औरत" में प्रकाशित हुई थी।

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