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गिरती जीडीपी गई भैंस पानी में, केंद्र सरकार 6 सालों में विकास और पुनरुत्थान में नाकाम रही है - शिव भाटिया


भैंस गइल बबुआ अब पनियाँ ने ! मौज करे बबुआ बगनियाँ ने !! यह कहावत बिहार के मगध प्रमंडल में उन लोगों पर चिरतार्थ होती है , जिनके पास काम नहीं होता और मेहनत मजदूरी करके अपना परिवार चलाते हैं, पर एक भैंस  ज़रूर रखते  है, जब भैस को चराने के लिये उसके खूंटे से 10 बजे दिन में खोलते हैं तो वह सीधे वहीं ले जाते हैं जहां हरी घांस होती है। और घांस वहाँ होता है जहां पोखर तालाब हो और उस में स्थायी रूप से पर्याप्त मात्रा में पानी जमा रहता है। अपनी भैंस को वह उसी तालाब के आस-पास चरने के लिए छोड़ देते है। कोई भैंस पर बैठा यदि भैंस चरा रहा है तो वह भैस चरवाहा के नियंत्रण में है और यदि नहीं तो फिर भैंस की मनमानी, भैंस चरते चरते जब उसकी पीठ गर्म हो जाती है तब वह किसी की नहीं मानती, वह पानी मे कूद के ही दम लेगी और जब पानी कूद पड़ी तो फिर 4 से 6 घण्टे के लिये फुरसत, पानी से बाहर ही नही आयेगी। फिर क्या चरवाहा को भी फुर्सत मिल गयी। वैसे उन चरवाहों का कहना है की जो भैंस अधिक देर तक यदि पानी रह जाती है वह अपना दूध सूखा लेतीं है, ज़यादा दूध नहीं देतीं। आज केंद्र की नई सरकार का भी यही हाल है 6 वर्षों से भारत की सत्ता जैसे तालाब में बैठ कर सारा का सारा खज़ाना ही खाते जा रही। अब तो आये दिन सरकारी महकमा निजीकरण होते जा रहा है , 2014 के बाद से भारत में विकास का सूरज धीरे धीरे अस्त होता जा रहा है, अब तो मध्यम सा अंधेरे की काली परछाई दिखाई दे रहा है। 

जिस कांग्रेस ने 70 वर्षों तक भारत की जनता को शिक्षित करने का काम किया, भारत को विकास की राह पर ला कर खड़ा किया, किसी भी आपदा में भारत की जनता को कभी परीशान नहीं होने दिया, हर आपदा में कांग्रेस जनता के साथ क़दम से क़दम मिला कर खड़ी रही, भारत को कभी सूखने ने नही दिया, हमेशा भारत को  हरा-भरा बनाये रखा।  लेकिन 2014 से अब तक जैसे सम्पूर्ण भारत सूखा की चपेट में आ चुका है, हर ओर त्राही त्राही मची हुयी है, जनता त्रास्त है भयावह तबाही दिखाई दे रही है, जनता लूटी - पिटी बैठी कराह है, और उसकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं, बल्कि हर और अत्यचारी उन पीड़ितों की कराह  सुन कर अठास लगा कर तालियां बजा रहें हैं।ऐसा लग रहा है की अब सब कुछ उजड़ सा गया है , देश सूखा की चपेट में है और वीरान सा हो गया है। 

 कांग्रेस ने हमेशा भारत को हरा भरा रखा और अपने चरवाहे को कभी भैस से अलग नहीं होने दिया हमेशा भैंस पर सवार ही रखा , यानी अफसरशाही को कभी बढ़ावा नहीं दिया यानी जनता को अवसरशाही पर हावी रखा तथा कारोबार और दलाली को जहां समतुल्यता एवं समान्यजस्ता बनाये रखा, वहीं आम गरीब एवं मध्यवर्गीय जनता एवं छोटे एवं मंझोले व्यापारिओं पर कभी अतिरिक्त भोझ पड़ने नहीं दिया। 

 एक कड़वी सच्चाई यह कि 2014 से पहले भारत मे आम जनता न तो जीडीपी जानती थी और ना ही ग्रोथ रेट ,न तो जीएसटी का ही कोई नामो निशान था। यह शब्द केवल अर्थशास्त्रीय विशषज्ञं लोग ही प्रयोग किया करते थे। परन्तु इन 6 वर्षों में भाजपा का कमाल कहें या भारत की विडंबना या भारत की जनता का सौभाग्य जो जीडीपी , जीएसटी , ग्रोथ रेट , तथा अन्य सभी टेक्स भी जान गयी। जिसके बारे में कभी जनता ने कभी सपनो में भी नहीं सोंचा होगा, बहरहाल एक बात तो माननी पड़ेगी, की भाजपा, सत्ता में आ कर भारत की जनता को जागृत कर दिया। दूसरी ओर जनता को इतना भयभीत कर दिया की लोग अब अपनों पर विश्वास  करना तो दूर लोग अपनों से डरने लगे हैं। यहां तक आम जनता में हिन्दू - मुसलमान करके समाज मे नफ़रत का ग्रोथ रेट इतना बढ़ा दिया कि एक समुदायें तो भारत के हिन्दुओं का ठेका ले कर दलित , पिछड़ी जातिओं और मुसलामानों का कहीं मोब्लिंचिंग कर रहा है तो कहीं संप्रदायीक दंगा भड़का रहा है। तो दूसरी और हुन्दुत्व के नाम पर राममंदिर, हिन्दूराष्ट्र के नाम पर लोगों को गुमराह कर अपनी जीडीपी इतनी बढ़ा दिया कि अब वह सम्पूर्ण भारत पर अपना ही क़ब्ज़ा दिखाता फिर रहा है । 

अब रही ठेकेदारी की बात तो भारत मे अडानी और अम्बानी ग्रुप छोड़ कर केंद्रीय सरकार के पास और कोई दूसरा विकल्प ही नहीं। क़र्ज़ लेना है तो अडानी, अम्बानी, क़र्ज़ देना है तो अडानी,। सरकारी ठेकेदारी देना है तो अडानी-अम्बानी को या कोई गुजराती इनके अपने चहिते को। केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों के शास्त्री भवन और कृषिभवन, उद्योग भवन के मरम्मती का ठेका एक गुजराती कम्पनी को दे दिया गया।

 नॉर्दन रेलवे महकमा कुछ स्टेशनों को निजीकरण कर दिया, तो 117 रेल को ठेकेदारी में दे दिया। अब एलआईसी का 25% प्रतिशत बेचने जा रही, हवाईअड्डा, सरकारी उद्योग, का कांट्रेक्ट साइन कर लिया और अब सुनने में आ रहा कि अक्टुबर में बैंकों का निजीकरण भी हो जाएगा। अब पीटीआई के हवाले से पता चाल रहा है की केंद्र सरकार ने एस्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को फरमान जार कर कहा है की 30 हज़ार कर्मचारिओं की छटनी करें।  देश का सबसे बड़ा बैंक एसबीआई अपने 30 हजार कर्मचारियों की छंटनी करने जा रहा है। बैंक अपने कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना लाने की तैयारी कर रहा है। एक झटके में 30 हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे। अब केंद्र सरकार ने एक नई नीति लागू कर फरमान जारी कर दिया की सरकारी कर्मचारिओं को अब 50 के उम्र में ही सेवानिर्वित कर दिया जायेगा। यह देश का दुर्भाग या विडंबना कहा जाये या देश के नौजवानो का सौभाग्य या कर्मचारिओं का दुर्भाग्य कहा जाए, जो एक ओर देश के सरकारी कर्मचारिओं को बेरोज़गार बना रही और दुसरी और भारत के युवाओ के साथ राज़गार देने का छलावा कर रही है। केंद्र सरकार वर्तमान में सरकारी कम्पनियों को निजीकरण कर के देश को बेरोजगारी के अलावा और क्या देने जा रहा है? पीटीआई के हवाले से ही इस योजना से 30,190 कर्मचारी बेरोज़गार हो सकते हैं।  
जिससे बैंक को दो हज़ार करोड़ की बचत होगी, ऐसे में सवाल उठता है की पिछले छह वर्षों से केंद्र द्वारा बचत का राग अलाप कर सरकार ने कितना रुपया जमा कर लिया, और यदि खज़ाना भर दिया , तो रुपया गया कहां? फिर सरकारी खज़ाना खाली कैसे हो गया और लगातार सरकारी कंपनियों को निजीकरण कर के केंद्र एक ओर पैसा उगाही कर रही है और तो दूसरे ओर लोगों की लगी लगाई नौकरियां छीन कर कर्मचारिओं को बेरोज़गार बनाते जा रही है। उसके बावजूद मीडिया, सरकार की बड़ाई करते नहीं थक रही और भाजपाई ताली बजाते नहीं थक रहे हैं। यह लोग भारत को किस दिशा में ले जा रहे हैं। और फिर इस देश का धन संसाधन रुपया जा कहाँ रहा है ? आरएसएस का मुख्यालय और दिल्ली कार्यालय का भव्य भवन इन 6 वर्षों में कैसे बन बन गया ?  आज तक इस पर सवाल किसी मीडिया ने क्यूँ नही पूछा?  

 एक कड़वा सच यह है कि भाजपा के सत्ता में आते ही सर्वपर्थम भाजपा की नयी पॉलिसी, नोटबंदी के कारण भारत की आर्थिक निति को सब से बड़ा झटका लगा था।  उसके बाद से लगातार अर्थव्यवस्था बिखरते और गिरते ही चला गया और अब कोरोना के कारण भारत की आर्थिक दशा इतनी खराब हो गयी की उसे सम्भलना तो दूर भारत सरकार उसे समानांतर लाने की भी कोशिश नहीं कर रही है, जिस से की भारत की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आये। केंद्र की नीतिओं के कारण आये दिन भारत को काफी नुक्सान का सामना करना पड़ रहा है। जिसकी चिंता पूरे देश को हो रही है देश की सम्पूर्ण जनता परीशान है, लेकिन देश की चिंता भाजपा को नहीं है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपने लिंक्डइन पेज पर एक पोस्ट में लिखा है कि देश की जीडीपी के गिरते आंकड़ों से समय रहते भारत को अलर्ट हो जाना चाहिए। राजन ने लिखा है कि जब इनफॉर्मल सेक्टर के आंकड़े जोड़े जाएंगे तो इकॉनमी में 23.9 फीसदी की गिरावट से और बदतर हो सकती है। उनका मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिका और इटली से भी ज्यादा नुकसान हुआ है। बता दे कि ये दोनों देश कोरोना वायरस महामारी के कारण  सबसे अधिक प्रभावित हैं। परन्तु केंद्र की  नीतिओं के कारण ऐसा लग रहा की केंद्र सरकार भारत की जनता को दक्षिण अफ्रिका बोसिनिया जैसा भुखमरी से मार कर लाशें गिनवाना चाहती है।  

 यदि जनता अब भी नहीं जागी तो भारत सरकार जनता को पंख उजड़े मुर्गे के समान अपने क़दमों पर नाक रगड़वा कर भूके मरवायेगी और लाशों को कुत्तों और चील कौवे से नुचवायेगी - भारत जैसा लोकतंत्र और संविधान पर विश्वास कर संवैधानिक प्रावधानों के तहत स्वतंत्र देश विश्व में कोई भी नहीं है। इसलिए यदि भारत की जनता को अपनी स्वतंत्रता बचानी है तो एक क्रान्ति फिर से इन अंग्रेज़ों के दलालों को भगाने की लिए लानी होगी। 

यह विचार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शिव भाटिया के अपने हैं। 

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