सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नसीरुद्दीन शाह एक ऐसा कलाकार जिसकी हर एक्टिंग में नजर आती है सत्यता

नसीरुद्दीन शाह एक कलाकार 

एस ए बेताब

        नसीरुद्दीन शाह कलाकार ही नहीं अदाकार भी है।

 नहीं चाहिए वो दिल फेंक आशिक जो महबूबा का हाथ थाम ते ही अपने हथियार फेंक दे। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार का यह डायलॉग फिल्म कर्मा में जब बोला गया तो सुनिए नसीरुद्दीन शाह ने क्या कहा था .. .  . ...... ...................आपको खूब अच्छी तरह याद होगा । मिर्जा गालिब में असद उल्लाह खां ग़ालिब का रोल हो या फिर फिल्म मोहरा में समाधान अखबार के एडिटर का वह रोल कौन भूल सकता है। "इस मदमस्त चेहरे ने मुझे दीवाना बना दिया  इन खूबसूरत होठों पर  अपने प्यार की मोहर लगाना चाहता हूं। "रोमा इस अंधे ने इस काले चश्मे के पीछे छिपी आंखों से तुम्हारे हुस्न को जिया है । और अनगिनत ऐसी यादें हैं  जो दर्शकों के  दिलो-दिमाग में रच- बस जाती हैं ।नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में उनकी कामयाबी। नसीर का नाम अगर पैरेलल सिनेमा के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं की सूची में शामिल हुआ तो बॉलीवुड की मुख्य धारा या व्यापारिक फ़िल्मों में भी उन्होंने बड़ी कामयाबी हासिल की है।

नसीर अपने शानदार अंदाज से मुख्य धारा के चहेते सितारे बन गए, ऐसा सितारा जिसने हर तरह के किरदार को बेहतरीन अभिनय से जिंदा कर दिया। ये सितार जब भी स्क्रीन पर आया देखने वाले के दिल पर उस किरदार की यादगार छाप छोड़ गया। उसकी कॉमेडी ने पब्लिक को खूब गुदगुदाया तो एक्शन में भी उसका अलग ही अंदाज नजर आया।मुख्य धारा सिनेमा में नसीरुद्दीन शाह के सफर की शुरुआत 1980 में आई फ़िल्म 'हम पांच' से हुई। फ़िल्म भले ही व्यापारिक थी, लेकिन इसमें नसीर के अभिनय की गहराई समानांतर सिनेमा वाली फ़िल्मों से कम नहीं थी। गुलामी को अपनी तकदीर मान चुके एक गांव में विद्रोह की आवाज बुलंद करते नौजवान के किरदार में नसीर ने जान फूंक दी।हालांकि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रही और एक व्यापारिक एक्टर के तौर पर सफलता साबित करने के लिए नसीर को टिकट खिड़की पर भी बिकाऊ बनने की जरूरत थी। और उनके लिए ये काम किया 'जाने भी दो यारों' ने। बॉलीवुड की ऑल टाइम बेस्ट कॉमेडी फ़िल्मों में शुमार 'जाने भी दो यारों' में रवि वासवानीऔर नसीर की जोड़ी ने बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग दिखाई और फ़िल्म बेहद कामयाब रही। लेकिन कमर्शियल सिनेमा में नसीर की सबसे बड़ी कामयाबी बनी 'मासूम'। बाप और बेटे के रिश्तों को उकेरती 'मासूम' में नसीर ने कमाल की अदाकारी से ना केवल खूब वाहवाही बटोरी बल्कि फ़िल्म भी सुपरहिट हुई और नसीर को एक स्टार का दर्जा मिल गया।नसीर के इस स्टार स्टेटस को और मजबूत किया 1986 में आई सुभाष घई की मल्टीस्टारर मेगाबजट फ़िल्म 'कर्मा' ने। फ़िल्म में नसीर के लिए अपनी छाप छोड़ना आसान नहीं था क्योंकि वहां अभिनय सम्राट "दिलीप कुमार भी थे। और उस दौर के नए नवेले सितारे जैकी श्राफ और अनिल कपूर  भी थे।1987 में गुलजार की 'इजाजत' नसीर के लिए कामयाबी का एक और जरिया बन कर आई। एक जज्बाती कहानी, बेहतरीन निर्देशन, शानदार अभिनय और यादगार संगीत। 'इजाजत' ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी हासिल की और बतौर व्यापारिक एक्टर नसीर का रुतबा और बढ़ गया। 'त्रिदेव' जैसी सुपरहिट फ़िल्म देकर, 90 का दशक आते-आते नसीर ने व्यापारिक फ़िल्मों में भी अपनी अलग पहचान बना ली थी।2003 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द लीग ऑफ एक्सट्रा ऑर्डिनरी जेंटलमेन' में नसीरुद्दीन ने कैप्टन नीमो का किरदार निभाया तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी फ़िल्म 'खुदा के लिए' में भी उन्होंने शानदार काम किया। देश से लेकर परदेस तक, नसीरुद्दीन शाह ने अपनी अदाकारी का लोहा सारी दुनिया में मनवाया है। लेकिन नसीर अपनी काबिलियत को खुशकिस्मती का नाम देते हैं। वो कहते हैं, 'मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे इतने मौके मिले, लेकिन मैं व्यापारिक फ़िल्मों से अभी संतुष्ट नहीं हूँ।'2008 में आई 'अ वेडनेसडे' ने नसीर की कमाल की अदाकारी का एक और नजराना पेश किया तो 'इश्किया', 'राजनीति', 'सात खून माफ' और 'डर्टी पिक्चर' जैसी फ़िल्मों के जरिए नसीरुद्दीन ने बार-बार ये साबित किया कि एक सच्चे कलाकार को उम्र बांध नहीं सकती। हाल ही में रिलीज हुई फ़िल्म 'मैक्सिमम' में भी नसीर की जोरदार एक्टिंग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया है।आज के नसीरुद्दीन शाह की बात करें तो शायद ही ऐसा कोई रोल है जो उनपर फिट नहीं बैठे। आखिर वो एक्टर ही ऐसे हैं कि हर रोल के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। लेकिन एक समय था जब नसीर को दो रोल करने की इच्छा थी जो उस समय उन्हें नहीं मिले। लेकिन बाद 'मिर्जा गालिब', दूरदर्शन धारावाहिक में उन्हें दो रोल मिले जिसमें उन्होंने ग़ालिब का वास्तविक चित्र उभारने की कोशिश की।लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि गालिब बनने की नसीर की तमन्ना उनके दिल में एक अधूरे ख्वाब की तरह अटकी हुई थी। 1988 में सीरियल बनाने से सालों पहले गुलजार साहब गालिब पर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उस फ़िल्म में गालिब के तौर पर उनकी दिली इच्छा संजीव कुमार को लेने की थी।नसीर साहब ने इस बारे में बताते हुए कहा, 'मैंने गुलजार भाई को चिठ्ठी लिखी और अपनी फोटोग्राफ्स भेजी, मैंने लिखा कि ये क्या कर रहे हैं, इस फ़िल्म में आपको मुझे लेना चाहिए।' लेकिन संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ गया था और सेहत उनका साथ नहीं दे रही थी। फिर उसके बाद गुलजार साहब के दिल में उस रोल के लिए अमिताभ के नाम का खयाल आया। लेकिन वहां भी बात नहीं बनी और आखिरकार गालिब पर फ़िल्म बनाने का प्लान ही ठंडे बस्ते में पड़ गया। शायद उस वक्त गुलजार को भी नहीं मालूम होगा कि इस किरदार पर तो तकदीर ने किसी और का नाम लिख दिया है। कई साल बाद गुलजार साहब ने एक दिन नसीर को फोन लगाया। नसीर ने बताया, 'एक दिन मुझे गुलजार भाई का फोन आया कि सीरियल में काम करोगे। मैंने पूछा कौन सा सीरियल तो उन्होंने बताया गालिब पर है। मैंने बिना कुछ सोचे फौरन हां कह दिया।'साल 1982 में 'गांधी' के रिलीज होने के अट्ठारह साल बाद कमल हासन ने 'हे राम' बनाई, जिसने नसीर साहब की गांधी बनने की तमन्ना को भी पूरा कर दिया। सधी हुई अदाकरी और बेजोड़ अंदाज से उन्होंने ना केवल गांधी के किरदार में जान डाल दी।बेजोड़ एक्टिंग और गजब की क्षमता से हर तरह के किरदार निभाने वाले नसीर ने अपनी छाप नकारात्मक भूमिकाओं में भी छोड़ी। समानांतर सिनेमा का ये हीरो कमर्शियल फ़िल्मों में एक ख़तरनाक विलेन के तौर पर भी हमेशा याद किया जाता रहेगा।हिन्दी सिनेमा में विलेन का ये नया चेहरा था, खूंखार और अजीबोगरीब शक्ल वाला कोई गुंडा नहीं बल्कि सोफेस्टिकेटेड इंसान जिसके दिमाग में सिर्फ जहर ही जहर था। विलेन का ये किरदार जितना संजीदा था उससे भी ज्यादा संजीदगी से उसे निभाया था नसीरुद्दीन शाह ने। वैसे खलनायक के तौर पर उनकी एक दो फ़िल्में नहीं थीं। 'मोहरा' में उन्होंने दिखाया विलेन का वो चेहरा जो किसी के भी दिल में खौफ पैदा कर सकता है। अंधा होने का नाटक करने वाला एक शिकारी, लेकिन ये नसीर की असली पहचान नहीं थी।

नसीर की असली पहचान समानांतर सिनेमा था। सिनेमा की वो धारा जिसमें एक स्टार के लिए कम और एक्टर के लिए गुंजाइश ज्यादा होती है। और ये बात किसी से छुपी नहीं कि नसीर एक एक्टर पहले और स्टार बाद में हैं। समानांतर सिनेमा के इस सितारे ने सिमता पाटिल, शबाना आजमी, अमरीश पुरी और्जैओमपुरी से माहिर कलाकारों के साथ मिलकर आर्ट फ़िल्मों को एक नई पहचान दी। 'निशान्त' जैसी सेंसेटिव फ़िल्म से अभिनय का सफर शुरू करने वाले नसीर ने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मिर्च मसाला', 'भवनी भवाई', 'अर्धसत्य', 'मंडी' और 'चक्र' जैसी फ़िल्मों में अभिनय की नई मिसाल पेश कर दी।नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। नसीरूद्दीन शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। अभिनय के इस प्रतिष्ठित संस्थान से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने के बाद वे रंगमंच और हिन्दी फ़िल्मों में सक्रिय हो गए। नसीरूद्दीन शाह की फ़िल्मों की सूची में समानांतर और मुख्य धारा की फ़िल्मों का अनूठा सम्मिलन देखने को मिलता है। आपके भाई लेफ्टिनेंट जनरल (सेवा निवृति जमीरूदीन शाह अलीगढ़  मुसलिम यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं।नसीरूद्दीन शाह ने अपने कॅरियर की शुरुआत फ़िल्म निशांत से की थी जिसमें उनके साथ स्मिता पाटिल औरशबाना आजमी जैसी अभिनेत्रियां थीं। 'निशांत' एक आर्ट फ़िल्म थी। यह फ़िल्म कमाई के हिसाब से तो पीछे रही पर फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की सबने सराहना की। इस के बाद नसीरुद्दीन शाह ने आक्रोश 'स्पर्श', 'मिर्च मसाला', 'अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है', 'मंडी', 'मोहन जोशी हाज़िर हो', 'अर्द्ध सत्य', 'कथा' आदि कई आर्ट फ़िल्में कीं।

आर्ट फ़िल्मों के साथ वह व्यापारिक फ़िल्मों में भी सक्रिय रहे। 'मासूम', 'कर्मा', 'इजाज़त', 'जलवा', 'हीरो हीरालाल', 'गुलामी', 'त्रिदेव', 'विश्वात्मा', 'मोहरा', सरफरोश जैसी व्यापारिक फ़िल्में कर उन्होंने साबित कर दिया कि वह सिर्फ आर्ट ही नहीं कॉमर्शियल फ़िल्में भी कर सकते हैं। नसीरूद्दीन शाह के फ़िल्मी सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने मसाला हिन्दी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कोई हिचक नहीं दिखायी। वक्त के साथ नसीरूद्दीन शाह ने फ़िल्मों के चयन में पुन: सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। बाद में वे कम मगर, अच्छी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे।

नसीरूद्दीन शाह ने एक फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। हाल ही में वह “इश्किया”, “राजनीति” और “जिंदगी ना मिलेगी दुबारा” जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेर चुके हैं। 
प्रस्तुति एस ए बेताब संपादक (बेताब समाचार एक्सप्रेस) हिंदी मासिक पत्रिका एवं यूट्यूब चैनल


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

india consists a number of ethnic groups sustaining diversity as its Core element .

 india consists a number of ethnic groups  sustaining  diversity as its Core element . Its quality may be summarized by  a simple illustration,  just a garden consist multiple colored flowers . Generally if a person is presented  a rose flower daily , with the passing of time he must express  his eager desire to have fragrant of another kind of flowers . So the diversity is the natural gift of God that’s reason in fact diversity is the beauty of india in the whole universe & the best example of good mankind which maintain several kinds of human taste . Indeed it calls for / invokes each Indian  to feel proud to be inhabitants of such diversified country .  Naturally diversity plays an  important role in the field of politics as well for the purpose of Governance which requires elected or chosen political Members in the Democratic system which is in force in our country as well who could lead its contribution by playing political role...

बनारस के महिला संगठन और सामजिक कार्यकर्ताओं की जांच टीम ने 5 नवम्बर को जमुआ हरिराम गांव का दौरा किया और अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की-

 सरकार की परियोजनाएं: महिलाओं का यौन उत्पीड़न: कौन है ज़िम्मेदार? एसडीएम ने कहा कि इसकी पीठ खूब मारने लायक है इसे मारो! हमने कहा कि साहब आपकी बहन-महतारी-बिटिया नहीं हैं.  आजमगढ़ में योगी सरकार की मंदुरी हवाई अड्डा विस्तारीकरण परियोजना के माध्यम से पुलिस प्रशासन द्वारा जमुआ हरिराम गाँव की महिलाओं का यौन उत्पीड़न पुलिस द्वारा लाठीचार्ज में क़ई महिलाएं हुई घायल कोई मेडिकल ट्रीटमेंट भी नहीं मिला विस्तारीकरण में 670 एकड़ उपजाऊ ज़मीन के अधिग्रहण होने की आशंका महिलाओं ने कहा न जान देंगे न जमीन देंगे न्याय के लिए सँघर्ष करेंगे मजदूर किसान आंदोलनरत आंदोलन में सबसे अधिक महिलाएं शामिल बनारस के महिला संगठन और सामजिक कार्यकर्ताओं की जांच टीम ने 5 नवम्बर को जमुआ हरिराम गांव का दौरा किया और अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की उत्तर प्रदेश के आज़मग़ढ़ जिले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के  ड्रीम प्रॉजेक्ट मंदुरी हवाई अड्डा विस्तारीकरण आजकल पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। आज़मग़ढ़ में पहले से ही एक हवाई पट्टी है लेकिन मुख्यमंत्री इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हावई अड्डे में तब्दील करके यूपी की अर्थ...

*EVM नये-छोटे-दलों का तथा BSP का उदय केंद्र मे नहीं होने दे रहा है*

(1)-पंडित पुजारी कि पार्टी काँग्रेस-BJP के नाटकीय नूरा-कुश्ती के खेल से 99% लोग अंजान है एक तरफ राहुल गाँधी भारत-जोड़ो-यात्रा का ढोंग कर रहे है तो दूसरी तरफ खडगे और शशी थरूर मे टक्कर दिखाकर खडगे (दलित) को काँग्रेस का अध्यक्ष बनाकर RSS-BJP कि जननी काँग्रेस BSP/भीमवादी दलित शेरनी बहन मायावती जी को शिकस्त देने के लिए दाँव-पेंच खेली है तथा इन बुद्ध के शूद्रो पर जो आज के MUSLIM SC ST OBC वंचित हजारों कलाकार जाति पेशेवर जाति वाले कामगार-श्रमिक-मजदूर-बहुजन लोग है इन्हे राजनीति के क्षेत्र में नपुंसक व अपाहिज बनाने के लिए जबरजस्त बेहतरीन चाल भी चली है इसलिए अम्बेडकर-वादी छुट भैये अवसर-वादी निकम्मा न बनकर 'भीमवादी-बनो' बहुजन हसरत पार्टी BHP कि बात पर तर्क करो गलत लगे तो देशहित-जनहित मे माफ करो* *(2)-जब-जब BSP को तोड़ा गया तब-तब Muslim Sc St Obc बुद्ध के शूद्र वंचित हजारों कलाकार जाति पेशेवर जाति वाले कामगार-श्रमिक-मजदूर-बहुजन लोगो ने उसके अगले ही चुनाव में BSP को 3-गुना ज्यादा ताकतवर बनाकर खड़ा किया है जैसे-1993/1995/1997 व 2002-03 में BSP को अ-संवैधानिक तरीके से तोड़कर समाजवादी पार्टी व BJP...