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चलो इश्क लड़ाएं!


मेरी मानसिक स्थिति पर शंका न करें ! मैं भी जानता हूं कि लड़ाई झगडे में कुछ नहीं रखा है ! मैं तो ये  भी जानता हूं कि इश्क कोई तीतर, बटेर या मुर्गा भी नहीं है कि जिसे लड़ाया जा सके ! वैसे मैं नेता भी नहीं हूं जो इश्क को लड़ाई झगडे में खींचू ! इश्क को कैसे लड़ाया जाता है, मुझे तो अभी ठीक ठीक पता भी नहीं है! राहत इंदौरी कहते थे कि ७० साल के बाद आदमी इश्क  के लायक होता है! ( क्योंकि इस उम्र में इश्क के अलावाऔर कुछ होता भी नहीं !)

   तो,,, मै १२ साल पहले क्या करूं?
     मेरा दुर्भाग्य देखिए, मै फर्स्ट फ्लोर पर रहता हूं, मुझसे नीचे ग्राउंड फ्लोर पे एक युवा कवि आया है! कवि की बीवी गांव गई है , और युवा कवि ने तीन दिन से नींद उड़ा रखी है! कोरोना काल में मंच मुक्त चल रहा कवि रात में घातक हो जाता है ! कल दिन भर अलाप लगाता रहा,  " चलो इश्क लड़ाएं ! चलो इश्क लड़ाएं,,,"! मुहल्ले वालों के कान खड़े हो गए ! युवा पत्नियों वाले  पति सावधान हो गए ! दो दिन शान्त रहने के बाद आज रात ठीक बारह बजे एक नए गीत के साथ कवि ने मेरी नींद उड़ा दी " अनामिका तू भी तरसे,,,,!"
      मै घबरा गया , क्या कवि अपनी नव विवाहित पत्नी को श्राप दे रहा हैै! विरह ने उसके दिमाग पर घातक असर डाला था! पहले तो मै खुश हुआ कि चलो अब कवि की रचना में इन्कलाब पैदा होगा, फिर उसके स्वर की तीव्रता में मुझे विरह में बारूद की गन्ध मिलने लगी। कवि अपनी प्रियतमा पर आरोप लगा रहा था," तुझे बिन जाने बिन पहचाने मैंने हृदय से लगाया,,,!"                  रात के चार बज चुके हैं, कवि विद्रोह रस में डूबा हुआ गा रहा है " जल गया जल गया मेरे दिल का जहां"!  मुझे लगा कि कवि गैस लाइटर लेकर सिलेण्डर पर बैठ चुका है। मै घबरा कर  पसीना पोछ रहा हूं और नीचे कवि पड़ोसियों पर निशाना साध रहा है, " सांस लेता हूं जब मुंह से निकले धुआं"! मै घबरा कर सोचने लगा , कहीं गुस्से में आकर कवि कपड़ा उतार कर चूल्हे पर तो नहीं बैठ गया !

       लोग तो यही कहेंगे , इसमें दिल का क्या कसूर !! 

 मेहमान  - लेखक सुल्तान भारती 
       

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