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जब जब किसान सड़क पर उतरा है अपनी मांग मनवा कर ही लौटा है - शौकत अली चेची


 कृषि विधेयक के विरोध में देश भर के किसान सडक पर उतर चुके हैं और पंजाब, हरियाणा से शुरू हुआ यह किसान आंदोलन सुलगता जा रहा है। हरियाणा और पंजाब के किसानों के समर्थन में उत्तर प्रदेश के करीब 32 किसान संगठन भी मैदान में कूद पड़े हैं। इससे एक तरह से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब किकर्तव्यविमूढ सी नजर आ रही है। कृषि विधेय ही नही नरेंद्र मोदी सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ अब देशभर के किसान चुप बैठने वाले भी नही है। नरेंद्र मोदी की सरकार अब बिजली बिल को लेकर भी एक कानून पारित करने जा रही है, जिसमें 2 भैंस से ज्यादा पशु रखने पर कमर्शियल कनेक्शन अनिवार्य किया जाएगा, उसका विरोध भी किसानों ने शुरु कर दिया है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां पर भाजपा की योगी सरकार किसानों को सताने में कतई पीछे नही है। गन्ने का भी 15000 करोड रुपए उत्तर प्रदेश के किसानों का सरकार पर बकाया है, उसको लेकर भी किसान परेशान हैं। किसानों का कहना है कि यदि गन्ने का भुगतान जल्दी नहीं किया गया तो सरकार के खिलाफ आर.पार की लड़ाई लड़ी जाएगी। इसके अलावा खाद बीज जिसमें कई शर्तें लागू की गई हैं। इनमें आधार कार्ड, पैन काड,र् जोत बही ओर इंतखाब जरूरी किया गया है। अब किसानों को सरकार से खाद बीज लेने के लिए ब्लॉक या ब्लाक की दुकानों पर यह सभी सबूत देने अनिवार्य कर दिए गए हैं। इसमें एक आधार कार्ड पर मात्र डाई यूरिया के केवल 5 घंटे ही मिलेंगे, यह सभी  किसान विरोधी फैसले हैं। सरकार बातचीत के बजाय तनाशाही रवैया अपना रही है। दमनचक्र अथवा आंदोलन को कुचल कर सरकार देश को बतानी चाहती है कि अन्नदाता सिर्फ एक पैर जूती तक है। किंतु देश में कोई जेल ऐसी नहीं बनी है जिसमें किसानों को क़ैद करा जा सके। किसान जायज मांग के लिये शांतिप्रिय तरीक़े से केंद्र सरकार के द्वार पर पहुंचे है। दुर्भाग्य ये है कि बातचीत की बजाय सरकार विशेषकर हरियाणा सरकार ने किसान को दबाने के कुत्सित कार्य किया हैं। अतीत पर गौर करें तो पता चलता है कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद जो किसानों के नाम पर आंदोलन या उनके आंदोलन हुए वे हिंसक और राजनीति से ज्यादा प्रेरित थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन,पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया। आमतौर पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की शुरुआत सन् 1859 से हुई थी, लेकिन चूंकि अंग्रेजों की नीतियों पर सबसे ज्यादा किसान प्रभावित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों ने किसान आंदोलनों की नींव डाली। सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद विरोध का मोर्चा किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन उनके शोषण से उपजे थे। वास्तव में जितने भी किसान आंदोलन हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। आंदोलनकारी किसान चाहे तेलंगाना के हों या नक्सलवाड़ी के हिंसक लड़ाके, सभी ने छापामार आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों ने देशी रियासतों की मद्द से दबा तो दिया, लेकिन देश में कई स्थानों पर संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन हुए। सन् 1918 में खेड़ा सत्याग्रह गांधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं बाद में मेड़ता बंधुओं,कल्याणजी तथा कुंवरजी ने भी सन् 1922 में बारदोली सत्याग्रह को प्रारंभ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल के हाथों में रहा। हालांकि किसानों का सबसे प्रभावी और व्यापक आंदोलन नील पैदा करने वाले किसानों का था। यह आंदोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में सन् 1859.1860 में किया गया। अपनी आर्थिक मांगों के संदर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आंदोलन उस समय का एक विशाल आंदोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिए ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली.सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को ददनी प्रथा कहा जाता था। इसी तरह का पहला विद्रोह पाबना आंदोलन जिले के किसानों से शुरू हुआ था। बंगाल के पाबना जिले के काश्तकारों को सन् 1859 में एक एक्ट द्वारा बेदखली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण प्राप्त हुआ था, लेकिन इसके बावजूद जमींदारों ने उनसे सीमा से अधिक लगान वसूला एवं उनको उनकी जमीन के अधिकार से वंचित किया। जमींदारों की ज्यादती का मुकाबला करने के लिए सन् 1873 में पाबना के यूसुफ सराय के किसानों ने मिलकर एक कृषक संघ का गठन किया। इस संगठन का मुख्य कार्य पैसे एकत्र करना एवं सभाएं आयोजित करना होता था, ताकि किसान आधिकाधिक रूप से अपने अधिकारों के लिए सजग हो सकें। उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की बात करें तो होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरीए सन् 1918 में उत्तर प्रदेश में किसान सभा का गठन किया गया। सन् 1919 के अंतिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। इस संगठन को जवाहरलाल नेहरू ने अपने सहयोग से शक्ति प्रदान की। उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने एका आंदोलन नामक आंदोलन चलाया। मोदी सरकार भी अंग्रेजों की राह पर ही चल रही है किंतु सरकार को अतीत से सबक लेना चाहिए जब जब किसान अपने हकों के लिए सडक पर उतरा किसान की ही जीत हुई और किसान विरोधी सरकारों का पतन हो गया।

लेखकः- चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज  ) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।

 

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