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आजादी के मतवालों (53) सन 1857


 आजादी के मतवाले (53)

सन1857 ( 2)

जून का महीना अंग्रेजों के लिए बड़ा कठिन था। जून की गर्मी और लू वह सहन नहीं कर सकते थे। सब्जी मंडी पुरानी जीतगढ़ पर अंग्रेजों से बड़ा गंभीर युद्ध हुआ।

 9 जून को इस युद्ध में 270 लोग मारे गए।

 25 जून को चीफ कमिश्नर दिल्ली श्री ए ब्रान्डर्थ द्वारा सचिव स्टेट ऑफ इंडिया को यह सूचित किया गया कि विद्रोही फौजों ने अपनी शक्ति फिर से इकट्ठा कर ली है। जालंधर ब्रिगेड नसीराबाद और अवध से भारी संख्या में विद्रोही फौजी यहां पहुंच गए हैं ।ग्वालियर और बरेली की भारतीय फौजों ने भी विद्रोह कर दिया है । इस सेना के कमांडर जमादार बख्त थे। अंग्रेजी फौज के दो व्यक्ति विद्रोहियों से आ मिले। उन्होंने यह बताया कि अंग्रेजी फौज घटकर मात्र दो हजार रह गई है।


( रोजनामचा अब्दुल लतीफ )

फारसी पृष्ठ 87 उर्दू 153

 उसमें विद्रोही सिपाहियों की संख्या 25 थी। परंतु कमांडरों में दक्षता एवं अनुभव की कमी के कारण उन्हें सफलता नहीं मिल सकी ।जनरल विल्सन अपनी सेना लेकर दिल्ली आ पहुंचा । सब्जी मंडी और ईदगाह का सराय में मोर्चाबंदी की गई। जुलाई के पहले सप्ताह में जमादार बख्त खां जो बख्तावर के नाम से प्रसिद्ध था, कुछ हजार सिपाही और ₹400000 लेकर दिल्ली पहुंचा। यह दूसरे कमांडो की तुलना में अधिक एवं अनुभवी था । बादशाह बहादुर शाह जफर ने अपने एक फरमान के द्वारा मिर्जा मुगल को गवर्नर जनरल और भक्त खाँ को प्रधानमंत्री बनाया। मिर्जा मुगल थे और बख्त खाँ पठान उनके आपसी द्वेष ने विद्रोही आंदोलन को काफी क्षतिपहुंचायी । मुगल पठानों की कमांड को नापसंद करते थे और पठान मुगलों की कमांड सहन नहीं करते थे । इसके विपरीत अंग्रेजों में पूरा तालमेल था। अंग्रेजों के जासूसों ने बताया कि विद्रोहियों के पास पांच मन गन बारूद और 4मन तेजाब  शोर है मगर सल्फर  बिल्कुल समाप्त हो गया है । इसलिए तोप काम नहीं कर रही है ।इसी बीच गुर्जरों की एक फौजी टुकड़ी विद्रोहियों से मिली उन्होंने मटकाफ हाउस लूट लिया। किशनगंज और रोहित गांव में 14 जुलाई को लड़ाई हुई। कश्मीरी गेट पर जमकर मुकाबला हुआ मगर विद्रोहियों को कोई अधिक सफलता नहीं मिली । अगस्त में बादशाह का खजाना समाप्त हो गया । वेतन ना मिलने से फौजी हताश एवं जनता परेशान हो गई। 7 अगस्त को चूड़ीवालन के शाही मैगजीन में आग लग गई। जनरल विल्सन  ने अपने दो हजार फौजियो के साथ मैटकोफ हाउस पर कब्जा करने के लिए आक्रमण कर दिया मगर उसे सफलता न मिल सकी । 14 अगस्त को नजफगढ़ के स्थान पर उसकी विद्रोहियों से मुठभेड़ हुई जनरल की जीत हुई। 

 9 सितंबर से 14 सितंबर तक अंग्रेजों की कहीं हार नहीं हुई। अंग्रेजों ने कश्मीरी गेट, मोरी गेट, गेट ईदगाह पर मोर्चा संभाल लिया दूसरी ओर विद्रोही फौजियों के पास हथियार थे ना रुपया ,पैसा फिर भी वह बहादुरी से लड़े।

 6 दिन की लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने पूरी विजय प्राप्त कर ली।

 कश्मीरी गेट से जामा मस्जिद और दूसरी ओर अलीपुर तक अंग्रेजों का कब्जा हो गया ।बहादुर शाह जफर ने लाल किले से निकलकर हुमायूं के मकबरे में शरण ली ।


21 सितंबर को बेगम जीनत महल और बहादुर शाह जफर के पोते मिर्जा अबू बकर को बादशाह से अलग कर दिया गया और गोली से उड़ा दिया गया । जब बहादुर शाह जफर के सामने उनके बेटे और पोतों की लाश को जनरल ने यह कहकर पेश किया कंपनी की तरफ से  यह आपके लिए तोहफा (भेंट) है तो बादशाह ने कहा यतीमो  की औलाद ऐसे ही सुरखुरू होकर बाप के सामने आया करती है।  3 दिन तक यह लाशें कोतवाली, चांदनी चौक में बेसहारा एवं बिना कफन के पड़ी रही । बादशाह  बहादुर शाह को अदालत में पेश किया गया। उन्हें  ईस्ट इंडिया कंपनी का बागी ठहराया गया ।फांसी के स्थान पर उम्र कैद की सजा दी गई । बहादुर शाह जफर, बेगम जीनत महल और मिर्जा जवांबख्त  को जिला वतन करके रंगून भेज दिया गया। 

 7 नवंबर अट्ठारह सौ बासठ को पहली स्वतंत्रता की लड़ाई के नेता बहादुर शाह जफर जिला वतनी के दौरान परलोक सिधार गए । दिल्ली पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजो ने सारे देश में बदले की कार्यवाई करने का निश्चय किया । लगभग 27 हजार फौजियों को मौत के घाट उतार दिया।  दक्षिण भारत में ऐसे बहुत से गांवों थे जहां वृक्ष से लटकी लाशो के चारों ओर चीले नजर आती थी। मुसलमान अंग्रेजों के जुल्म उसके अधिक निशाना बने क्योंकि 18 57 की लड़ाई और विद्रोह में उन्होंने सबसे अधिक बढ़ चढ़कर भाग लिया था । हजारों मुसलमानों को केवल इसलिए फांसी पर चढ़ा दिया  कि वह  मुसलमान थे। इसलिए उन्हें मार डाला गया । उर्दू बाजार, बाजार चांदनी चौक ,दरियागंज घाटी पाड़ा ,और राम जी दास गोदामवाले के मकान ,अकबरी मस्जिद, औरंगाबाद मस्जिद को इस तरह बर्बाद किया कि उनके नामोनिशान तक बाकी ना छोड़ा । प्रस्तुति एस ऐ बेताब (संपादक बेताब समाचार एक्सप्रेस) हिंदी मासिक पत्रिका

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