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पत्रकार की चोरी हुई मोटरसाइकिल की तफ्तीश

 पत्रकार की मोटरसाइकिल चोरी और उसकी तफ्तीश के संबंध में जो कहानी उभर कर सामने आई उस कहानी को हम आपके सामने पेश कर रहे हैं । एक पत्रकार जिसे इस बात का बड़ा अभिमान था कि पुलिस उसकी मोटरसाइकिल को बरामद कर लेगी। इसके लिए उसने क्या- क्या प्रयास किए और उसका यह अभिमान किस तरह से चकनाचूर हुआ। यह सब कुछ बताया गया है इस कहानी में इस कहानी के कुछ पात्र और घटनास्थल को बदल दिया गया है ताकि गोपनीयता बनी रहे। आप इसे यूं समझ सकते हैं कि  एक पत्रकार की मोटरसाइकिल चोरी होने के बाद उस पर जो कुछ गुजरती है और  एक आम नागरिक की मोटरसाइकिल चोरी होने के बाद उस पर तो न जाने क्या क्या  चीजें गुजरती हैं आइए अब हम आपको पूरी कहानी, पूरा वृतांत बताते हैं।

एक पत्रकार की कहानी उसी की जुबानी 

11 अप्रैल 2005 दिन के करीब 3:15 बजे मैं अपनी मोटरसाइकिल यूपी 15 के 9987 से शाहदरा जोन नगर निगम कार्यालय में गया उस समय वहां पर एओ मिस्टर अनीस अहमद साहब बैठे थे। उस दिन गर्मी काफी थी ए ओ साहब ने अपने चपरासी देवीलाल को ठंडा लेने के लिए भेज दिया कि  दो पेप्सी ले आए ,वह दो पेप्सी की बोतल लाने के लिए एमसीडी ऑफिस से बाहर गया ।उसे आने में काफी देर हो गई। इसी बीच में मुझे कुछ ऐसा एहसास हुआ कि जब मैंने पार्किंग में गाड़ी खड़ी करी थी तो उस गाड़ी के आसपास कोई संदिग्ध युवक खड़ा था जिसकी उम्र 17 अट्ठारह साल रही होगी । मेरे जेहन में फौरन उस युवक की तस्वीर आ गई और मुझे कुछ ऐसा आभास हुआ कहीं यह मेरी मोटरसाइकिल चोरी ना कर ले मैं एओ  साहब से कहकर कि 

"मैं भी आता हूं जरा अपनी गाड़ी देख कर । 

और मैं अपनी मोटरसाइकिल पार्किंग में देखने के लिए गया जो ऑफिस के गेट के सामने खड़ी थी, मैंने देखा गाड़ी वहां से गायब थी। मैं फोरन वापस एओ साहब के कमरे में आया। "साहब मेरी गाड़ी चोरी हो गई है  । ए ओ साहब तुरंत अपनी कुर्सी से उठे और वह मेरे साथ बाहर तक आए और आकर उन्होंने देखा और आसपास इधर-उधर देखा उस पार्किंग वाले को बुलाया और उससे पूछा 

तो गाड़ी कहीं नहीं थी इसके बाद मै और ए ओ साहब  दोनों थाने में पहुंचे । मैं यहां थाने का नाम स्वागत ले रहा हूं। स्वागत थाने में हमने तहरीर दे दी और तहरीर देकर हम वापस आ गए । ए ओ  साहब को मेरी मोटरसाइकिल चोरी होने का बड़ा दुख हो रहा था कि कोई साहब मेरे पास आए और उनकी मोटरसाइकिल चोरी हो गई। उन दिनों स्वागत थाने के इंचार्ज प्रसन्न कुमार थे। वैैैैसे भी  एसएचओ और एसीपी से अक्सर मुलाकात होती रहती थी ,तो मुझे ऐसा आभास था कि मेरी मोटरसाइकिल शायद पुलिस ढूंढ निकालेगी। स्वागत थाने में 12 अप्रैल 2005 को मेरी एफ आई आर दर्ज की गई। स्वागत थाने में कुछ डोजियर दिखाएं ।जिसमें से एक व्यक्ति पर हमने शक जाहिर किया,लेकिन पुलिस ने उस व्यक्ति को पकड़ना तो दूर उससे पूछताछ भी नहीं की ।

13 अप्रैल को मैं स्वागत थाने में गया। क्योंकि मैं अब पैदल हो चुका था एक पत्रकार बिना मोटरसाइकिल के कैसे रिपोर्टिंग करेगा उसका अंदाजा मुझे था।और पुलिस ने बताया कि हम कोशिश कर रहे हैं। 14 अप्रैल को में एक बार फिर थाने गया तो बताया गया कि हमारी टीम गई हुई है। 20 अप्रैल को मैं एक बार फिर थाने गया और आईओ हेड कांस्टेबल अवतार से मिला उन्होंने बताया कि लोनी में उस पते पर वह व्यक्ति नहीं रहता है जिस व्यक्ति पर शक था। उसका नाम सादिक ( बदला हुआ नाम) वह कर्दमपुरी में गिरीश चंद्र के मकान में अपने भाई वसीम (बदला हुआ  नाम )के पास आता जाता है और जो चोरी की बिजली सप्लाई का काम करता है। मैं 4 दिन बाद एक बार फिर आई ओ  अवतार से मिला और पूरा पता निकाल कर आई ओ  को दिया।

 मैं बिजी हूं मैं, मै एस एच ओ से  भी मिला उन्होंने एएसआई श्री राम को पूरी बात बताने को कहा । 

25 अप्रैल को मैं एक बार फिर आई ओ से मिला और कर्दमपुरी में सादिक के भाई से मिलने को चलने के लिए कहा। भाइयों ने कहा शाम को फोन कर लेना मैंने शाम को फोन किया उन्होंने कहा रात 9:00 बजे चलेंगे और हम रात्रि 9:00 बजे के बाद आई ओ  के साथ सादिक के घर पहुंचे वहां सादिक के बारे में आई ओ ने उससे पूछताछ करके अपनी फाइल में नोट किया और उसका फोन नंबर लिया और उससे कहा कि जब फोन करूं तो अपने भाई को लेकर आ जाना।

 मैं 25 अप्रैल को थाने गया और आई ओ से मिला, आई ओ ने कहा कि मुझे कोर्ट जाना है शाम को आना मैं उसे बुला लूंगा मैं एक बार फिर शाम को थाने गया ।

आई ओ ने उसे फोन किया और बताया कि उसने सुबह लाने का वादा किया है। इस तरह 25 अप्रैल का दिन पूरा हुआ। 26 अप्रैल की सुबह में एक बार फिर थाने गया आई ओ ने फोन किया और दोपहर को लाने की बात बताई, दोपहर को मेरे पास फोन आया कि वह शाम को लाएगा। मैं शाम को थाने पहुंचा तो थाने में आई ओ नहीं थे। मैंने फोन किया।आई ओ  ने कहा मैं फोटो चौक पर हूं । मैं तुरंत फोटो चौक पहुंचा और आई ओ से मिला उन्होंने एक बार फिर मेरे सामने अपने मोबाइल से उस व्यक्ति को फोन मिलाया। उस व्यक्ति ने सुबह लाने को कहा। फोन सुनने के बाद आई ओ  ने मुझे बताया कि पुलिस से लोग डरते हैं कहीं बंद ना कर दे इसलिए नहीं ला रहा है। सुबह आ जाएगा 11:00 बजे मैं फोन कर दूंगा ।

27 अप्रैल को जब फोन नहीं आया तो मैंने खुद फोन किया तब आई ओ  ने बताया कि वह लेकर नहीं आया है। मैं समझ गया कि कुछ खेल चल रहा है। मैं स्वयं थाने जा पहुंचा। तब आई ओ  ने फोन किया उधर से जवाब आया

 उसने कहा कि मैं लेकर आ रहा हूं। मैंने आई ओ से  कहा कि आईडी प्रूफ के तौर पर आई कार्ड ,पहचान पत्र, डीएल आदि भी मंगवा लेना क्योंकि मुझे शक था कि  वह किसी दूसरे शख्स को ले आएगा । इसके 2 मिनट बाद ही उसका फोन आया कि वह अपनी फूफी के यहां चला गया है। तब आई ओ  ने मुझसे कहा कि शाम को 160 का नोटिस देकर मैं पूछताछ के लिए बुलवा लूंगा। 

 मैंने शाम को 8:00 बजे जब फोन किया तो मुझे जवाब मिला कि खान साहब मैं फाइल किसी दूसरे आदमी को दे रहा हूं। आप उससे मिल लेना। मैंने पूछा कि अचानक क्या बात हो गई जब आप मुझे तीन-चार दिन से रोज बहका रहे हैं तो फिर अचानक यह फाइल दूसरे आदमी को देने की बात कहां से आ गई। उन्होंने फोन काट दिया एमसीडी की जिस पार्किंग से मोटरसाइकिल चोरी हुई थी तब भी मैंने एसएचओ से वहां के कर्मचारियों की मिलीभगत की आशंका व्यक्त की थी इसके बाद एसएचओ ने एक कांस्टेबल को एमसीडी कार्यालय भेजा। उसने बताया कि उपायुक्त ने कर्मचारियों को नहीं लाने दिया।  इसके बाद एस ए च ओ ने  160 का नोटिस भेजकर बुलाने की बात बताई। मुझे बताया गया कि रविंद्र नामक पुलिसकर्मी द्वारा यह नोटिस भेजा गया है । 26  अप्रैल को जब मैं आई ओ से मिलने गया तो मुझे एक रजिस्टर में एंट्री करने को कहा गया।  मैंने पूर्व की भांति एंट्री कर दी। जब मैं रिसेप्शन पर गया और आई ओ के बारे में मालूम किया वहां मौजूद मैडम ने मुझे रिकॉर्ड रूम भेज दिया। वहां पर आई ओ नहीं मिले। तो वहां पर खड़े एक सिपाही ने कड़क आवाज में कहा के अंदर क्यों आने देते हो, मैंने तो निगम पार्षद को भी धक्के देकर बाहर निकाल दिया था। जब आई ओ नहीं है तो यहां कैसे आए। मैंने नरमी से मैडम से पूछा आई ओ से फोन पर बात कराने को कहा,मैडम ने आई ओ  से मोबाइल पर बात करवा दी।  कि वह किसी चैन स्नैचिंग के मामले में फोटो चौक पर थे फोटो चौक  का एक ऐसा इलाका था जहां पर अक्सर वारदातें होती रहती थी।  30 अप्रैल को शाम को करीब 6:00 बजे मैं एसएचओ प्रसन्न कुमार से मिला पूरा वृतांत एक बार फिर सुनाया। उन्होंने बताया कि आप के मामले की तस्वीर हेड कांस्टेबल श्री सिताराचंद को दे दी गई है। उन्होंने मुझे सलीम नामक कांस्टेबल से मिलने को कहा मैं सलीम से मिला उन्होंने पूरी कहानी सुनी और एक डायरी में नोट कर ली। मुझे मोटरसाइकिल मिलने की संभावनाएं क्षीण होती नजर आ रही थी। 2 मई को एसएचओ प्रसन्न कुमार से एक बार फिर मिला। उन्होंने बड़े सभ्यता के साथ बैठाया एक कप चाय पिलाई और वही आश्वासन देखकर रुखसत कर दिया। 

 4 मई 2005 को स्वागत थाने में हेड कांस्टेबल सिताराचंद से मिला उन्होंने कहा कि मेरे पास तफ्तीश नहीं है । आप की तफ्तीश विजयपाल पर है। आई ओ विजयपाल से मिलना चाहा लेकिन ना विजयपाल मिले ना मोटरसाइकिल प्राप्त करने में विजय मिली। 

6 मई 2005 को एसीपी मिलन राव से मिला। राव साहब ने एसएचओ से बात की और आश्वासन दे दिया अभी भी मैं गलतफहमी में ही जी रहा था। मुझे यह अंदाजा था कि शायद एसीपी की डांट का एसएचओ पर कुछ असर हो जाए। लेकिन मेरी यह गलतफहमी भी दूर हो गई। और 9 मई को एसएचओ प्रसन्न कुमार का तबादला हो गया था। यह जानकारी थाने में पहुंचने के बाद मुझे मिली।  हेड कांस्टेबल विजयपाल अभी भी नहीं मिले मैं एक बार फिर 14 मई 2005 को एसीपी मिलन राव से मिला। 15 मई 2005 को अवतार से एक बार फिर मिला उन्होंने बताया कि विजयपाल के पास जांच है, अब मैं घर अपने प्रयास से कोशिश करने लगा कि शायद मोटरसाइकिल मिल जाए। एक बार फिर थाने में आया तो पता चला विजयपाल को 30 अप्रैल 2005 को जांच मिल गई थी और उन्होंने लोनी में जाकर किसी से पूछताछ की है। 17 मई को थाने से फोन आया कि कांस्टेबल ने बुलाया है, मुझे कुछ आशा  लगी कि शायद हो सकता है ....           उसने बताया कि यहां थाने में कुछ मोटरसाइकिल खड़ी है देख लो इनमें तो कोई आपकी मोटरसाइकिल नहीं है, यह जानते हुए भी कि मेरी मोटरसाइकिल उनमें नहीं है। मैंने जाकर देखा मेरी मोटरसाइकिल तो उसमें थी ही नहीं।

 17 मई 2005  को पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल अधिकारियों से मिला एडिशनल डीसीपी को एक ज्ञापन दिया। इसके बाद भी कहीं से कोई सुराग नहीं लगा। नए आए एसएचओ भारत भूषण से पत्रकार मिले उन्होंने जांच सब इंस्पेक्टर को दे दी और जांच अधिकारी ने जो जांच की इस बार उन्होंने कोई आश्वासन कोई फॉर्मेलिटी पूरी नहीं की और सीधे कोर्ट में एफआर लगा दी । 9/12 /2005 को गृह मंत्री को भी एक ज्ञापन दिया गया और जिस तरह से हजारों लाखों  ज्ञापन गृह मंत्रालय में पहुंचते हैं उनमे एक ज्ञापन का और इजाफा हो गया। भारत देश की राजधानी दिल्ली में चोरी हुई पत्रकार की एक मोटरसाइकिल की तफ्तीश की इस कहानी ने अपना सफर खत्म किया। 

यह कहानी किसी के साथ भी हो सकती है यह कहानी सत्यता पर आधारित है पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं प्रस्तुति एस ए बेताब संपादक "बेताब समाचार एक्सप्रेस"


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टिप्पणियाँ

  1. ये कहानी पुलिस और प्रशासन की बखिया भी उधेड़ती है और हकीकत में उनके सुस्त और नाकारा सिस्टम की कलई भी खोलती है । ऐसी कहानियां आगे भी आती रहें ।

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    1. आपने कहानी को पसंद किया शुक्रिया इंशाल्लाह आगे भी इस तरह की कहानियां प्रकाशित होती रहेगी

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